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सोमवार, 21 सितंबर 2026

RAW vs IB: 1887 से 2026 तक का पूरा इतिहास, रॉ और आईबी में क्या अंतर है? जानिए काम, अधिकार और नियंत्रण

 


RAW vs IB: 1887 से 2026 तक का पूरा इतिहास, रॉ और आईबी में क्या अंतर है? जानिए काम, अधिकार और नियंत्रण

भारत की सुरक्षा व्यवस्था में खुफिया एजेंसियों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। देश के भीतर होने वाली गतिविधियों से लेकर सीमा पार और दूसरे देशों में होने वाले रणनीतिक बदलावों तक, सरकार को समय रहते सही जानकारी उपलब्ध कराना राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा है। भारत में इस जिम्मेदारी से जुड़े दो सबसे महत्वपूर्ण नाम इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ के हैं। दोनों एजेंसियों का काम खुफिया जानकारी जुटाने और उसका विश्लेषण करने से जुड़ा है, लेकिन इनके कार्यक्षेत्र, प्रशासनिक व्यवस्था और जिम्मेदारियों में बड़ा अंतर है। 2026 में रॉ अपनी स्थापना के 58 वर्ष पूरे कर चुकी है, जबकि आईबी का इतिहास 23 दिसंबर 1887 से शुरू होता है। यानी दोनों संस्थाओं की स्थापना के बीच करीब 81 साल का अंतर है।

1887 में हुई आईबी की शुरुआत, ऐसे बदला नाम

भारत की केंद्रीय खुफिया व्यवस्था का इतिहास 19वीं सदी के अंतिम दौर तक जाता है। 23 दिसंबर 1887 को ब्रिटिश शासन के दौरान सेंट्रल स्पेशल ब्रांच की स्थापना की गई थी। इसका शुरुआती उद्देश्य गुप्त और राजनीतिक खुफिया जानकारी जुटाना था। बाद में इसका नाम बदलकर सेंट्रल क्रिमिनल इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट किया गया और 1920 में इसे इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी के नाम से जाना जाने लगा। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार आईबी ने 1987 में अपने अस्तित्व के 100 वर्ष पूरे किए और 1988 में इसका शताब्दी वर्ष मनाया गया। इस हिसाब से 2026 में आईबी अपने 139वें वर्ष में है और दिसंबर 2026 में स्थापना के 139 वर्ष पूरे करेगी।आजादी के बाद आईबी को स्वतंत्र भारत की सुरक्षा जरूरतों के अनुसार नया स्वरूप मिला। शुरुआती दशकों में इसके पास आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ विदेशी खुफिया जानकारी जुटाने की भी जिम्मेदारी थी। समय के साथ भारत की सुरक्षा चुनौतियां बढ़ीं और बाहरी खुफिया के लिए अलग व्यवस्था की जरूरत महसूस होने लगी। इसी बदलाव ने आगे चलकर रॉ के गठन की जमीन तैयार की।

1962 और 1965 के युद्ध के बाद क्यों महसूस हुई अलग एजेंसी की जरूरत?

रॉ के गठन की कहानी को समझने के लिए 1962 और 1965 के युद्धों को समझना जरूरी है। 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ। इसके बाद भारत की खुफिया और सुरक्षा व्यवस्था में कई स्तरों पर सुधार की आवश्यकता महसूस की गई। 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ और इस दौरान भी बाहरी खुफिया जानकारी की अहमियत सामने आई। सरकारी पुलिस प्रकाशनों में दर्ज इतिहास के अनुसार आईबी ने 1962 से पहले चीन की गतिविधियों के बारे में चेतावनी दी थी और 1965 में पाकिस्तान की सैन्य गतिविधियों से संबंधित महत्वपूर्ण इनपुट भी दिए थे, लेकिन इसके बावजूद भारत में एक अलग बाहरी खुफिया संस्था बनाने की आवश्यकता महसूस की गई।इसी पृष्ठभूमि में 21 सितंबर 1968 को रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ की स्थापना हुई। आरएन काव को इसका पहला प्रमुख बनाया गया। आईबी के विदेशी खुफिया संग्रह वाले हिस्से को अलग करके रॉ के गठन के साथ बाहरी खुफिया को एक अलग संस्थागत पहचान मिली। इस तरह 1968 के बाद भारत की खुफिया व्यवस्था में आंतरिक और बाहरी खुफिया के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन विकसित हुआ।

2026 में रॉ को हुए 58 साल

रॉ की स्थापना 21 सितंबर 1968 को हुई थी। 21 सितंबर 2026 को इस संस्था ने 58 वर्ष पूरे किए। यानी 2026 तक रॉ की यात्रा 58 साल की हो चुकी है, जबकि आईबी की स्थापना को 138 वर्ष से अधिक समय हो चुका है। दोनों के बीच उम्र का यह अंतर यह भी बताता है कि भारत की आंतरिक खुफिया व्यवस्था रॉ से कई दशक पुरानी है। रॉ का गठन किसी नई सुरक्षा जरूरत को पूरा करने के लिए हुआ था, जबकि आईबी का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा।2026 में रॉ की 58वीं वर्षगांठ के मौके पर इसके संस्थापक प्रमुख आरएन काव की भूमिका और 1968 में इसके गठन की परिस्थितियों पर फिर चर्चा हुई। शुरुआती वर्षों में काव ने ऐसी संस्था विकसित करने पर जोर दिया जिसकी विशेषज्ञता भारत के बाहर से संबंधित रणनीतिक और सुरक्षा जानकारी जुटाने में हो।

रॉ का काम क्या है?

रॉ भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी है। इसका मुख्य कार्य दूसरे देशों और भारत के बाहर होने वाली ऐसी गतिविधियों से संबंधित खुफिया जानकारी जुटाना और उसका विश्लेषण करना है जिनका भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक हितों, रक्षा या विदेश नीति पर प्रभाव पड़ सकता है। सरकारी दस्तावेजों में रॉ को बाहरी खुफिया संग्रह की प्रमुख संस्था के रूप में वर्णित किया गया है। इसके कार्यक्षेत्र में विदेशी सरकारों की नीतियों, सैन्य गतिविधियों और रणनीतिक परिस्थितियों से संबंधित आकलन भी शामिल हो सकते हैं।रॉ का काम केवल किसी दूसरे देश के बारे में जानकारी जुटाना नहीं है। उस जानकारी को समझना, उसका विश्लेषण करना और नीति निर्धारकों तक उपयोगी आकलन पहुंचाना भी खुफिया व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सीमा पार आतंकवाद, विदेशी सैन्य गतिविधियां, रणनीतिक गठबंधन और भारत के खिलाफ बाहरी सुरक्षा खतरों से जुड़ी सूचनाएं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

आईबी का काम क्या है?

आईबी का मुख्य कार्य देश के भीतर की खुफिया जानकारी और आंतरिक सुरक्षा से संबंधित मामलों पर केंद्रित है। इसमें आतंकवाद, जासूसी, उग्रवाद, देश के भीतर सक्रिय सुरक्षा नेटवर्क और अन्य ऐसी गतिविधियों से संबंधित जानकारी शामिल हो सकती है जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। गृह मंत्रालय के वर्तमान प्रशासनिक ढांचे में आईबी से संबंधित प्रशासनिक और वित्तीय मामलों की जिम्मेदारी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के अंतर्गत आती है।आईबी केंद्र और राज्यों के बीच खुफिया समन्वय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राज्य पुलिस की विशेष शाखाओं और अन्य सुरक्षा संस्थाओं के साथ सूचना साझा करना आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार आईबी देश के भीतर खुफिया जानकारी जुटाने के साथ आतंकवाद-रोधी और प्रति-खुफिया गतिविधियों के लिए भी महत्वपूर्ण संस्था है।

रॉ और आईबी में सबसे बड़ा अंतर क्या है?

रॉ और आईबी में सबसे बड़ा अंतर उनके कार्यक्षेत्र का है। रॉ का मुख्य क्षेत्र बाहरी खुफिया है, जबकि आईबी का मुख्य क्षेत्र आंतरिक खुफिया है। रॉ विदेशों और भारत के बाहर होने वाली रणनीतिक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करती है, जबकि आईबी भारत के भीतर की सुरक्षा चुनौतियों और खुफिया गतिविधियों से संबंधित जानकारी पर काम करती है।स्तर पर भी अंतर स्पष्ट है। आईबी गृह मंत्रालय के अंतर्गत आती है, जबकि रॉ कैबिनेट सचिवालय के ढांचे से जुड़ी है। केंद्र-राज्य संबंधों पर सरकारी रिपोर्ट में आईबी को गृह मंत्रालय का हिस्सा और रॉ को कैबिनेट सचिवालय के तहत काम करने वाली बाहरी खुफिया एजेंसी बताया गया है।

रॉ और आईबी में कौन ज्यादा ताकतवर है?

अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि रॉ और आईबी में से कौन ज्यादा शक्तिशाली है। लेकिन दोनों की जिम्मेदारियां अलग होने के कारण ऐसी तुलना पूरी तरह सही नहीं बैठती। किसी विदेशी देश की सैन्य, राजनीतिक या रणनीतिक गतिविधि से संबंधित मामले में रॉ की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, जबकि भारत के भीतर आतंकवाद, जासूसी या आंतरिक सुरक्षा के मामले में आईबी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।खुफिया एजेंसी की क्षमता केवल उसके प्रशासनिक अधिकारों से तय नहीं होती। सूचना जुटाने की क्षमता, विश्लेषण, तकनीकी संसाधन, मानव स्रोत और समय पर सही सूचना उपलब्ध कराने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए रॉ और आईबी को एक-दूसरे से ऊपर या नीचे रखने के बजाय उनकी अलग-अलग जिम्मेदारियों को समझना ज्यादा उचित है।

1971 के युद्ध में रॉ की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है?

रॉ की स्थापना के केवल तीन साल बाद 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ। यह नई एजेंसी के शुरुआती इतिहास का महत्वपूर्ण दौर था। उस समय पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियां तेजी से बदल रही थीं और इसका भारत की सुरक्षा पर सीधा प्रभाव पड़ रहा था।हाल के ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार नवंबर 1971 में रॉ से जुड़े खुफिया तंत्र को पाकिस्तान की ओर से संभावित हवाई हमले की जानकारी मिली थी। यह सूचना भारतीय पक्ष तक पहुंचाई गई और 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान द्वारा हवाई हमले शुरू किए जाने पर भारत पहले से तैयार था। इसके 13 दिन बाद 16 दिसंबर को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। यह घटनाक्रम रॉ के शुरुआती वर्षों की महत्वपूर्ण खुफिया उपलब्धियों में गिना जाता है।हालांकि खुफिया अभियानों के अधिकांश विवरण सार्वजनिक नहीं होते, इसलिए किसी अभियान के हर पहलू को सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर पूरी तरह समझना संभव नहीं है। 1971 का युद्ध यह जरूर दिखाता है कि सैन्य कार्रवाई के साथ समय पर मिलने वाली खुफिया जानकारी कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है।

रॉ और आईबी के प्रशासनिक ढांचे में क्या अंतर है?

आईबी का प्रशासनिक संबंध गृह मंत्रालय से है। गृह मंत्रालय की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में आईबी से जुड़े प्रशासनिक और वित्तीय मामले शामिल हैं। दूसरी तरफ रॉ कैबिनेट सचिवालय के ढांचे में काम करती है। कैबिनेट सचिवालय केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय और निर्णय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।रॉ और आईबी के बीच समन्वय भी जरूरी है। आधुनिक सुरक्षा चुनौतियां कई बार केवल भारत के अंदर या केवल भारत के बाहर तक सीमित नहीं रहतीं। उदाहरण के लिए किसी विदेशी नेटवर्क का संबंध भारत के अंदर सक्रिय समूह से हो सकता है। ऐसे मामलों में बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार की खुफिया जानकारी एक-दूसरे को पूरा कर सकती है। सरकारी दस्तावेजों में भी दोनों एजेंसियों के बीच समन्वय की आवश्यकता का उल्लेख मिलता है।

2026 में दोनों एजेंसियों के सामने कौन सी नई चुनौतियां हैं?

2026 तक भारत की सुरक्षा चुनौतियां 1968 की तुलना में काफी बदल चुकी हैं। पारंपरिक सैन्य खतरे और सीमा संबंधी चुनौतियां आज भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके साथ साइबर सुरक्षा, तकनीकी निगरानी, अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क, संगठित अपराध, आर्थिक सुरक्षा और तेजी से बदलती वैश्विक रणनीतिक परिस्थितियां भी जुड़ गई हैं।इस बदलते माहौल में रॉ के लिए विदेशों से रणनीतिक जानकारी जुटाने की आवश्यकता बढ़ी है, जबकि आईबी के लिए देश के भीतर बदलते सुरक्षा खतरों पर नजर रखना महत्वपूर्ण है। इंटरनेट और डिजिटल संचार ने सुरक्षा चुनौतियों को और जटिल बनाया है, क्योंकि किसी गतिविधि का स्रोत विदेश में हो सकता है लेकिन उसका प्रभाव भारत के भीतर दिखाई दे सकता है। ऐसे मामलों में बाहरी और आंतरिक खुफिया के बीच समन्वय की भूमिका और बढ़ जाती है।

1887 से 2026 तक की पूरी कहानी एक नजर में

1887 में सेंट्रल स्पेशल ब्रांच की स्थापना से भारत की केंद्रीय खुफिया व्यवस्था के आधुनिक इतिहास की शुरुआत मानी जाती है। 1904 में इसका नाम सेंट्रल क्रिमिनल इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट किया गया और 1920 में इसे इंटेलिजेंस ब्यूरो के नाम से जाना गया। 1962 और 1965 के युद्धों के बाद भारत की बाहरी खुफिया क्षमता को अलग करने की आवश्यकता महसूस हुई। 21 सितंबर 1968 को रॉ की स्थापना हुई और आरएन काव इसके पहले प्रमुख बने। 1971 के युद्ध में नई बाहरी खुफिया व्यवस्था की भूमिका चर्चा में आई। इसके बाद दोनों एजेंसियां अपने-अपने कार्यक्षेत्र में विकसित होती रहीं। 2026 में रॉ के 58 वर्ष पूरे हो चुके हैं, जबकि आईबी दिसंबर 2026 में अपनी स्थापना के 139 वर्ष पूरे करेगी।इस पूरी समयरेखा से साफ होता है कि रॉ और आईबी किसी एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं। आईबी की जड़ें 1887 तक जाती हैं और इसका मुख्य क्षेत्र आंतरिक सुरक्षा तथा देश के भीतर की खुफिया जानकारी है। रॉ का गठन 1968 में हुआ और इसका मुख्य क्षेत्र बाहरी खुफिया है। 2026 में दोनों एजेंसियां अलग-अलग जिम्मेदारियों के साथ भारत की सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। बदलती तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिस्थितियों के दौर में इनके बीच प्रभावी समन्वय राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि प्रत्येक एजेंसी की अपनी विशेषज्ञता।

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