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सोमवार, 24 अगस्त 2026

Rajasthan High Court: बच्चों के जंक फूड से AI तक पर हाईकोर्ट सख्त, स्कूलों के 50 मीटर दायरे में HFSS फूड पर रोक; हर स्कूल में बनेगी कमेटी


 

Rajasthan High Court: बच्चों के जंक फूड से AI तक पर हाईकोर्ट सख्त, स्कूलों के 50 मीटर दायरे में HFSS फूड पर रोक; हर स्कूल में बनेगी कमेटी


राजस्थान हाईकोर्ट ने Gen-Z, Gen-Alpha और Gen-Beta के स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और भविष्य को लेकर बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने सोमवार को बच्चों और युवाओं से जुड़े कई गंभीर मुद्दों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य और केंद्र सरकार से कार्रवाई की जानकारी और आगे की योजना मांगी। इनमें स्कूलों में जंक फूड की बिक्री, परीक्षा में पेपर लीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI का बढ़ता प्रभाव, बच्चों का स्क्रीन टाइम, मानसिक स्वास्थ्य और ग्रामीण सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं।जोधपुर पीठ में न्यायमूर्ति अनूप कुमार धांड ने कहा कि आज के बच्चे आने वाले समय में देश के कार्यबल, नेतृत्वकर्ता और जिम्मेदार नागरिक बनेंगे। इसलिए उनके स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े सवालों को केवल वर्तमान की समस्या मानकर नहीं देखा जा सकता। अदालत ने इस मामले को “In the matter of Welfare and Future of Generation Gen-Z, Gen-Alpha and Gen-Beta” के रूप में लिया है।


स्कूल के अंदर और 50 मीटर तक HFSS फूड पर सख्ती

हाईकोर्ट ने स्कूल परिसर और स्कूल गेट से 50 मीटर के दायरे में हाई फैट, शुगर और साल्ट यानी HFSS खाद्य पदार्थों की बिक्री पर रोक को प्रभावी तरीके से लागू करने का निर्देश दिया है।इसमें कार्बोनेटेड ड्रिंक, चिप्स, अधिक वसा वाले बेकरी उत्पाद और दूसरे HFSS खाद्य पदार्थ शामिल हैं। स्कूल कैंटीन में उपलब्ध खाद्य पदार्थों के कैलोरी और पोषण संबंधी विवरण प्रदर्शित करने को भी कहा गया है।यहां यह समझना जरूरी है कि 50 मीटर की सीमा हाईकोर्ट ने पहली बार तय नहीं की है। FSSAI के Food Safety and Standards (Safe Food and Balanced Diets for Children in Schools) Regulations, 2020 में भी स्कूल कैंटीन और स्कूल के आसपास 50 मीटर के क्षेत्र में HFSS खाद्य पदार्थों की बिक्री और प्रचार को प्रतिबंधित करने का प्रावधान है। अब राजस्थान हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया है।


चार सप्ताह में हर स्कूल में फूड सेफ्टी कमेटी

कोर्ट ने प्रत्येक स्कूल में Food Safety and Nutrition Committee बनाने का निर्देश दिया है। यह समिति स्कूल में विद्यार्थियों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और पोषण पर नजर रखेगी।समिति में शिक्षक, अभिभावक और छात्र प्रतिनिधि शामिल किए जाने हैं। स्कूल कैंटीन में क्या बिक रहा है, भोजन की गुणवत्ता कैसी है और पोषण संबंधी जानकारी उपलब्ध है या नहीं, इन पहलुओं पर निगरानी बढ़ाई जाएगी।मामला केवल कैंटीन तक सीमित नहीं है। पीएम पोषण जैसी योजनाओं के तहत बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता भी इस व्यापक खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनती है।


हर महीने निरीक्षण, आठ सप्ताह में गांवों के स्कूलों की जांच

हाईकोर्ट ने आदेश के पालन के लिए नियमित निरीक्षण की व्यवस्था पर भी जोर दिया है। जिला मजिस्ट्रेट और ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों को मासिक निरीक्षण करने के निर्देश दिए गए हैं।इसके अलावा राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग और जिला कलेक्टरों को गांवों के सरकारी स्कूलों में आठ सप्ताह के भीतर औचक निरीक्षण करने के निर्देश दिए गए हैं। इससे अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि सरकारी स्कूलों की स्थिति और बच्चों के लिए उपलब्ध सुविधाओं की वास्तविक तस्वीर सामने आए।


स्कूलों की हालत पर कोर्ट की सीधी चिंता

अदालत की चिंता केवल भोजन तक सीमित नहीं है। हाईकोर्ट ने ग्रामीण और सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।कोर्ट ने खाली शिक्षक पद भरने, प्रधानाचार्य और अन्य स्टाफ की कमी दूर करने, कंप्यूटर शिक्षकों और काउंसलरों की नियुक्ति, स्मार्ट क्लासरूम, इंटरनेट, स्वास्थ्य सुविधाएं, शौचालय, पेयजल, बिजली, खेल मैदान और खेल सुविधाएं बेहतर करने की जरूरत बताई है। छात्राओं की सुरक्षा के लिए सीसीटीवी और महिला स्टाफ की जरूरत पर भी ध्यान दिया गया है।यानी अदालत ने शिक्षा की गुणवत्ता को सिर्फ किताब और शिक्षक तक सीमित नहीं माना है। स्कूल का पूरा वातावरण बच्चे के विकास का हिस्सा है।


AI आए, लेकिन बच्चों की सोच पीछे न छूटे

हाईकोर्ट ने शिक्षा में AI के बढ़ते इस्तेमाल को भी महत्वपूर्ण चुनौती माना है। अदालत ने AI को पूरी तरह खारिज नहीं किया, बल्कि इस बात पर जोर दिया कि बच्चों को बदलती तकनीक के लिए तैयार करते समय उनकी मौलिक सोच, लेखन और विश्लेषण क्षमता कमजोर नहीं होनी चाहिए।कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से पाठ्यक्रम में AI, डेटा और हरित कौशल, उद्योग से जुड़े प्रशिक्षण और इंटर्नशिप जैसे पहलुओं को शामिल करने पर भी कार्रवाई योजना मांगी है। साथ ही AI साक्षरता, डेटा सुरक्षा और साइबर सुरक्षा शिक्षा को बढ़ावा देने की बात कही गई है।इसका अर्थ यह है कि अदालत का नजरिया “AI बनाम पारंपरिक पढ़ाई” का नहीं है। चुनौती यह है कि विद्यार्थी AI का इस्तेमाल सीखें, लेकिन हर उत्तर के लिए मशीन पर निर्भर न हो जाएं।


मोबाइल स्क्रीन टाइम पर भी नीति बनाने का निर्देश

बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम को लेकर भी हाईकोर्ट ने चिंता जताई है। अदालत ने ज्यादा डिजिटल उपकरण इस्तेमाल होने से नींद, एकाग्रता, सामाजिक कौशल और पढ़ने-लिखने की क्षमता पर पड़ने वाले संभावित असर का उल्लेख किया है। राज्य को बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करने के लिए नीति तैयार करने की दिशा में कदम उठाने को कहा गया है।यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चों की पढ़ाई तेजी से मोबाइल, टैबलेट और ऑनलाइन सामग्री पर निर्भर हो रही है। ऐसे में डिजिटल शिक्षा और डिजिटल अनुशासन के बीच संतुलन जरूरी हो गया है।


पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने युवाओं के सामने मौजूद चुनौतियों में बार-बार होने वाले परीक्षा पेपर लीक को भी शामिल किया है। अदालत ने परीक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए “फूलप्रूफ और मजबूत तंत्र” तैयार करने की जरूरत बताई है।यह निर्देश राजस्थान की भर्ती और प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। पेपर लीक सिर्फ परीक्षा रद्द होने का मामला नहीं है। इससे लाखों अभ्यर्थियों का समय, पैसा और मानसिक दबाव प्रभावित होता है और पूरी भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।


मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल बर्नआउट पर भी जोर

हाईकोर्ट ने युवाओं की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और डिजिटल बर्नआउट को भी गंभीरता से लिया है। अदालत ने सुलभ मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और इससे जुड़े उपायों की जरूरत बताई है।यह निर्देश शिक्षा व्यवस्था के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विद्यार्थी केवल परीक्षा के दबाव से नहीं जूझते। पढ़ाई, प्रतियोगिता, रोजगार की अनिश्चितता, सोशल मीडिया और लगातार ऑनलाइन रहने का दबाव भी उनके अनुभव का हिस्सा है।


Gen-Z से आगे Gen-Alpha और Gen-Beta भी क्यों?

इस मामले की खास बात यह है कि अदालत ने केवल वर्तमान युवा पीढ़ी यानी Gen-Z पर ध्यान नहीं दिया। Gen-Alpha और Gen-Beta को भी मामले में शामिल किया गया है।इसका संकेत साफ है अदालत आज की किसी एक समस्या का तत्काल समाधान भर नहीं चाहती, बल्कि आने वाले दशकों में बच्चों को किस तरह का समाज, शिक्षा व्यवस्था और तकनीकी वातावरण मिलेगा, इसे भी मुद्दा मान रही है।कोर्ट ने सरकारों को इन मुद्दों पर आगे की कार्रवाई के लिए रिपोर्ट और योजनाएं पेश करने को कहा है। साथ ही मुख्य सचिव की अध्यक्षता में Gen-Z, Gen-Alpha और Gen-Beta Monitoring Cell बनाने का निर्देश दिया गया है, जो हर तीन महीने में प्रगति की समीक्षा करेगा।


अब असली परीक्षा सरकार की

हाईकोर्ट के निर्देशों में मुद्दों की सूची लंबी है, लेकिन चुनौती उससे भी बड़ी है। स्कूलों में कमेटियां बनाना आसान हिस्सा है; असली सवाल यह होगा कि वे वास्तव में काम करेंगी या सिर्फ कागज पर रहेंगी।50 मीटर के दायरे में HFSS खाद्य पदार्थों की बिक्री रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर नियमित निरीक्षण चाहिए। सरकारी स्कूलों में शिक्षक, शौचालय, पेयजल, बिजली और इंटरनेट जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए बजट और समयबद्ध काम चाहिए। AI के लिए पाठ्यक्रम बदलने के साथ शिक्षकों को भी प्रशिक्षित करना होगा। वहीं स्क्रीन टाइम पर नीति बनाना केवल स्कूलों से संभव नहीं होगा, इसमें परिवार और डिजिटल प्लेटफॉर्म का व्यवहार भी महत्वपूर्ण होगा।राजस्थान हाईकोर्ट का यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बच्चे को केवल विद्यार्थी नहीं, बल्कि भविष्य के नागरिक के रूप में देखा गया है। जंक फूड से लेकर AI, स्क्रीन टाइम से लेकर पेपर लीक और स्कूल की इमारत से लेकर मानसिक स्वास्थ्य तक अदालत ने उन सभी चीजों को एक साथ जोड़ा है जो आने वाली पीढ़ी के विकास को प्रभावित कर सकती हैं। अब नजर इस बात पर होगी कि सरकार इन निर्देशों को कितनी गंभीरता और कितनी तेजी से जमीन पर लागू करती है।

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