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सोमवार, 24 अगस्त 2026

OPINION: 67 हजार शिक्षक पद खाली, राजस्थान की शिक्षा कब तक अतिथि भरोसे?



 OPINION: 67 हजार शिक्षक पद खाली, राजस्थान की शिक्षा कब तक अतिथि भरोसे?

राजस्थान के सरकारी स्कूलों में शिक्षक संकट अब ऐसा आंकड़ा बन चुका है जिसे देखकर भी नजरअंदाज करना मुश्किल है। आज सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में वरिष्ठ अध्यापक और व्याख्याताओं के कुल 67,104 पद खाली हैं। इनमें वरिष्ठ अध्यापक के 51,877 और व्याख्याताओं के 15,227 पद शामिल हैं। इसी बीच जुलाई से सितंबर के बीच शिक्षा विभाग के 4,230 कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने का अनुमान है। यानी जिस समस्या का समाधान अभी तक पूरी तरह नहीं हो पाया, आने वाले महीनों में उसके और गहरा होने का खतरा है। सरकार ने तत्काल राहत के लिए विद्या संबल योजना के तहत अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था शुरू की है।यहां से राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था का सबसे असहज सवाल शुरू होता है। जब सरकार खुद मान रही है कि स्कूलों में हजारों शिक्षक पद खाली हैं, तो फिर स्थायी भर्ती के बजाय हर बार अतिथि शिक्षक से काम चलाने की नौबत क्यों आती है? क्या राजस्थान के सरकारी स्कूलों के लिए शिक्षक कोई स्थायी जरूरत नहीं हैं? क्या शिक्षक की कमी केवल तब तक की समस्या है, जब तक परीक्षा का परिणाम नहीं आता? या सरकार ने अस्थायी व्यवस्था को ही शिक्षा प्रबंधन का आसान रास्ता मान लिया है?


अतिथि शिक्षक रखना अपने आप में गलत फैसला नहीं है। जिस स्कूल में शिक्षक नहीं है, वहां बच्चों को बिना शिक्षक छोड़ देने से बेहतर है कि किसी योग्य व्यक्ति को तत्काल कक्षा में भेजा जाए। लेकिन यहां असली समस्या उस समय पैदा होती है जब आपातकालीन व्यवस्था ही नियमित व्यवस्था का विकल्प बन जाए। अगर हर साल खाली पदों के सामने अतिथि शिक्षक खड़े कर दिए जाएंगे और स्थायी भर्ती अपनी गति से चलती रहेगी, तो यह सवाल उठेगा ही कि सरकार आखिर कब तक स्कूलों को अस्थायी सहारे पर चलाएगी।आज के आंकड़े सिर्फ यह नहीं बताते कि 67 हजार पद खाली हैं। वे यह भी बताते हैं कि राजस्थान की शिक्षक व्यवस्था में लगातार खालीपन पैदा हो रहा है। एक तरफ नए शिक्षक आने चाहिए, दूसरी तरफ पुराने शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं। अगर भर्ती की रफ्तार सेवानिवृत्ति की रफ्तार से पीछे रही तो खाली पदों की संख्या घटने के बजाय बढ़ती जाएगी। सरकार को इसलिए केवल मौजूदा रिक्तियों की गणना नहीं करनी चाहिए, बल्कि अगले तीन से पांच वर्षों में कितने शिक्षक सेवानिवृत्त होंगे और कितने नए शिक्षकों की जरूरत पड़ेगी, इसका भी अनुमान सार्वजनिक करना चाहिए।


क्योंकि शिक्षक की कमी कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे परीक्षा के एक परिणाम के बाद अचानक खत्म कर दिया जाए। भर्ती की प्रक्रिया में विज्ञापन, आवेदन, परीक्षा, परिणाम, दस्तावेज सत्यापन, नियुक्ति और पदस्थापन जैसे कई चरण होते हैं। अगर यह पूरी प्रक्रिया वर्षों तक खिंचती है तो स्कूल में खाली पड़ी कक्षा इंतजार नहीं करती। बच्चा उसी समय पढ़ रहा होता है, उसी समय उसका पाठ्यक्रम आगे बढ़ रहा होता है और उसी समय उसकी नींव तैयार हो रही होती है। सरकारी भर्ती की देरी का बिल अंततः बच्चे की पढ़ाई को चुकाना पड़ता है।यही इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू है। शिक्षक का खाली पद सरकारी कागज में एक संख्या हो सकता है, लेकिन स्कूल में वह एक खाली कुर्सी नहीं, बल्कि एक अधूरी कक्षा है। अगर वरिष्ठ कक्षाओं में किसी विषय का शिक्षक नहीं है तो विद्यार्थी उस विषय की पढ़ाई कैसे करेंगे? अगर व्याख्याता उपलब्ध नहीं है तो 11वीं और 12वीं के विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा और आगे की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कौन तैयार करेगा? अगर किसी स्कूल में एक ही शिक्षक कई विषयों और कक्षाओं का बोझ उठा रहा है तो उससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद कितनी वास्तविक है?


राजस्थान के सामने समस्या सिर्फ शिक्षकों की कुल संख्या की नहीं है। समस्या विषयवार और स्कूलवार उपलब्धता की भी है। हो सकता है किसी जिले में कुल शिक्षक संख्या बहुत खराब न दिखे, लेकिन उसी जिले के कई स्कूलों में गणित, विज्ञान, अंग्रेजी या किसी अन्य महत्वपूर्ण विषय के शिक्षक न हों। कागज पर पद भरे हुए दिख सकते हैं, लेकिन बच्चे जिस विषय को पढ़ना चाहते हैं, उसका शिक्षक अगर कक्षा में नहीं है तो उस आंकड़े का विद्यार्थियों के लिए कोई अर्थ नहीं है। इसलिए सरकार को अब केवल कुल रिक्तियों का आंकड़ा बताने से आगे बढ़कर स्कूलवार और विषयवार रिक्तियों का पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।आज की रिपोर्ट में जयपुर की स्थिति भी चिंता पैदा करती है। जिले के 1,049 सरकारी स्कूलों में स्वीकृत पदों के मुकाबले 2,873 पद खाली बताए गए हैं। इनमें ग्रेड-2 के 1,140 पद रिक्त हैं। ग्रेड-1 में 689, ग्रेड-3 लेवल-2 में 405 और ग्रेड-3 लेवल-1 में 324 पद खाली बताए गए हैं। प्रशिक्षकों और शारीरिक शिक्षकों के 186 तथा प्रयोगशाला सहायकों के 127 पद भी रिक्त हैं। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं; ये बताते हैं कि राजधानी जैसे जिले में भी शिक्षक व्यवस्था पूरी तरह भरी हुई नहीं है।


अब सवाल यह है कि अगर जयपुर जैसे जिले में इतनी बड़ी संख्या में पद खाली हैं तो राजस्थान के दूरदराज और ग्रामीण इलाकों की स्थिति कितनी चुनौतीपूर्ण होगी? और अगर सरकार का जवाब यह है कि इन पदों पर अतिथि शिक्षक लगा दिए जाएंगे, तो फिर अगला सवाल और सीधा है क्या अतिथि शिक्षक बच्चों की तत्काल जरूरत पूरी करेंगे या सरकार को स्थायी समाधान की दिशा में भी उसी गति से आगे बढ़ना होगा?अतिथि शिक्षक को लेकर एक और वास्तविकता समझनी होगी। सरकार ने इस व्यवस्था में व्याख्याता के लिए अधिकतम 30 हजार रुपये, वरिष्ठ अध्यापक के लिए 25 हजार रुपये और ग्रेड-3 शिक्षक के लिए 21 हजार रुपये तक मासिक मानदेय का प्रावधान बताया है। चयन जिला स्तर पर समिति के जरिए मेरिट के आधार पर किया जाएगा और पात्र सेवानिवृत्त शिक्षक भी इसमें शामिल हो सकते हैं। लेकिन यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से अस्थायी है और इससे किसी अभ्यर्थी को नियमित नियुक्ति या नियमितीकरण का अधिकार नहीं मिलेगा।यानी सरकार खुद कह रही है कि यह स्थायी शिक्षक भर्ती नहीं, खाली पदों के सामने अस्थायी व्यवस्था है। तो फिर स्थायी समाधान कहां है?


यही सवाल शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है। राजस्थान में बड़ी संख्या में ऐसे अभ्यर्थी हैं जो शिक्षक भर्ती की तैयारी करते हैं, पात्रता परीक्षाएं पास करते हैं और सरकारी भर्ती का इंतजार करते हैं। दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में हजारों पद खाली हैं। एक तरफ योग्य उम्मीदवार नौकरी की तलाश में है और दूसरी तरफ सरकारी स्कूल योग्य शिक्षक की तलाश में है। दोनों के बीच अगर सबसे बड़ी बाधा भर्ती प्रक्रिया की धीमी गति है तो सरकार को उस प्रक्रिया पर भी सवाल उठाने चाहिए।यह स्थिति बेरोजगारी और शिक्षक कमी का अजीब विरोधाभास पैदा करती है। शिक्षक बनने वाला युवा कहता है कि नौकरी नहीं है, स्कूल कहता है कि शिक्षक नहीं है और सरकार बीच में अतिथि शिक्षक की व्यवस्था खड़ी कर देती है। क्या यह व्यवस्था लंबे समय तक चल सकती है?सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा में अस्थायी व्यवस्था की अपनी सीमा होती है। एक अतिथि शिक्षक भी पूरी ईमानदारी से पढ़ा सकता है, लेकिन अगर उसकी नियुक्ति अल्पकालिक है तो स्कूल में निरंतरता का सवाल बना रहता है। बच्चे पूरे साल एक ही शिक्षक से पढ़ना चाहते हैं। शिक्षक को भी अपने काम की स्थिरता चाहिए। स्कूल प्रशासन को भी पता होना चाहिए कि अगले महीने या अगले सत्र में कक्षा कौन संभालेगा। शिक्षा का माहौल तभी मजबूत बनता है जब उसमें स्थायित्व हो।


इसलिए सरकार को अतिथि शिक्षकों को स्थायी शिक्षक का विकल्प नहीं, अंतरिम पुल मानना चाहिए। पुल का काम मंजिल तक पहुंचाना होता है, मंजिल बन जाना नहीं। अगर विद्या संबल योजना के जरिए आज स्कूलों में शिक्षक पहुंचाए जा रहे हैं तो साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि नियमित भर्ती कब होगी और खाली पद कब तक भरे जाएंगे। सरकार को भर्ती का स्पष्ट कैलेंडर जारी करना चाहिए, ताकि अभ्यर्थी और स्कूल दोनों अनिश्चितता से बाहर निकल सकें।एक और गंभीर प्रश्न से सरकार को बचना नहीं चाहिए। अगर जुलाई, अगस्त और सितंबर में ही शिक्षा विभाग के 4,230 कर्मचारी सेवानिवृत्त होने वाले हैं तो आने वाले वर्षों के लिए शिक्षक भर्ती की योजना कितनी दूर तक तैयार है? अगर सरकार आज खाली पद भरती है और अगले साल बड़ी संख्या में नए पद फिर खाली हो जाते हैं तो वही चक्र दोबारा शुरू हो जाएगा। इसलिए केवल रिक्तियां भरना पर्याप्त नहीं है; भर्ती और सेवानिवृत्ति का संतुलित चक्र बनाना होगा।राजस्थान में सरकारी स्कूलों को बचाने की बहस सिर्फ भवन, शौचालय, स्मार्ट कक्षा या डिजिटल उपकरण तक सीमित नहीं हो सकती। इन सबकी अपनी जगह जरूरत है, लेकिन स्कूल का केंद्र शिक्षक है। जिस कक्षा में शिक्षक नहीं है, वहां सबसे महंगी तकनीक भी शिक्षा की मूल कमी पूरी नहीं कर सकती। बच्चे को स्क्रीन नहीं, समझ चाहिए; सामग्री नहीं, मार्गदर्शन चाहिए; पाठ्यक्रम नहीं, उसे समझाने वाला व्यक्ति चाहिए।आज राजस्थान के सामने 67,104 रिक्तियों का आंकड़ा है। इसे सरकार के लिए सिर्फ प्रशासनिक चुनौती समझना गलत होगा। यह राज्य की शिक्षा नीति की परीक्षा है। सरकार चाहे तो इसे अवसर बना सकती है रिक्तियों का पूरा आंकड़ा सार्वजनिक करे, विषयवार जरूरत तय करे, भर्ती का समयबद्ध कैलेंडर जारी करे, सेवानिवृत्ति के हिसाब से भविष्य की जरूरत का अनुमान लगाए और तब तक अतिथि शिक्षकों को पारदर्शी तरीके से लगाए।


लेकिन अगर सरकार ने फिर वही रास्ता चुना कि खाली पद आते रहें और अतिथि शिक्षक आते रहें, तो कुछ समय बाद सवाल फिर वही खड़ा होगा।राजस्थान के बच्चों को हर साल नया अस्थायी शिक्षक नहीं चाहिए। उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें शिक्षक की कुर्सी स्थायी रूप से भरी हो।सरकार के पास आज दो रास्ते हैं। पहला आसान रास्ता रिक्त पदों पर अतिथि शिक्षक लगाओ, कुछ महीनों के लिए समस्या दबाओ और आगे बढ़ जाओ। दूसरा मुश्किल रास्ता भर्ती व्यवस्था को तेज करो, स्थायी नियुक्तियां करो, विषयवार रिक्तियां खत्म करो और यह सुनिश्चित करो कि सेवानिवृत्ति से पहले नए शिक्षक तैयार हों। पहला रास्ता प्रशासन के लिए आसान हो सकता है, लेकिन दूसरा रास्ता बच्चों के भविष्य के लिए जरूरी है।क्योंकि राजस्थान के सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं कि वहां शिक्षक कभी नहीं आते। समस्या यह है कि शिक्षक की जरूरत स्थायी है, लेकिन समाधान बार-बार अस्थायी दिया जाता है।और अब 67 हजार से ज्यादा खाली पदों के बाद सरकार से यही सवाल पूछा जाना चाहिए क्या अतिथि शिक्षकों से राजस्थान की कक्षाएं चलती रहेंगी, या सरकार आखिर वह दिन भी तय करेगी जब किसी सरकारी स्कूल को शिक्षक की कमी के कारण अपनी कक्षा अधूरी नहीं छोड़नी पड़ेगी?

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