OPINION: शिक्षा में बढ़ती पूंजी के दौर में जरूरी सवाल, स्कूल कारोबार बनेंगे या बेहतर नागरिक गढ़ेंगे
भारत में शिक्षा के निजी क्षेत्र में पैसा तेजी से पहुंच रहा है। जुलाई 2026 की रिपोर्टों में पारंपरिक स्कूल श्रृंखलाओं में निजी इक्विटी की बढ़ती दिलचस्पी सामने आई। वजह साफ है स्कूलों में फीस से नियमित नकदी आती है, एक विद्यार्थी कई वर्षों तक संस्था से जुड़ा रहता है और आर्थिक मंदी में भी परिवार शिक्षा पर खर्च पूरी तरह बंद नहीं करते। यानी निवेश की नजर में शिक्षा स्थिर और आकर्षक क्षेत्र है। लेकिन सवाल है: अगर स्कूल निवेश का ठिकाना बन रहा है, तो बच्चे का भविष्य किसकी प्राथमिकता रहेगा?निजी निवेश का विरोध समाधान नहीं। अच्छे विद्यालय को भवन, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल सुविधा, तकनीक और प्रशिक्षित शिक्षक चाहिए। निजी पूंजी इन संसाधनों को बढ़ा सकती है। समस्या पूंजी के आने में नहीं, उसके उद्देश्य में है। शिक्षा में लगाया गया पैसा यदि बेहतर शिक्षक, बेहतर सीखने और अधिक अवसर पैदा करता है तो वह सामाजिक निवेश है। लेकिन यदि उसका केंद्र फीस बढ़ाना, ब्रांड का विस्तार और अधिकतम लाभ बन जाए तो विद्यालय धीरे-धीरे शिक्षा संस्था से कारोबारी इकाई में बदल सकता है।2024-25 में देश में 14.71 लाख स्कूल, 24.69 करोड़ विद्यार्थी और एक करोड़ से अधिक शिक्षक दर्ज हुए। निजी गैर-सहायता प्राप्त विद्यालयों की संख्या लगभग 3.40 लाख है। यानी निजी स्कूल अब व्यवस्था का छोटा हिस्सा नहीं हैं। करोड़ों परिवारों का बच्चों की शिक्षा के लिए इन पर भरोसा है। इसलिए निजी शिक्षा की गुणवत्ता, फीस, शिक्षक व्यवस्था और सामाजिक जिम्मेदारी अब केवल निजी संस्थान का मामला नहीं, सार्वजनिक महत्व का विषय है।
खतरा तब पैदा होता है जब विद्यार्थी को ग्राहक और अभिभावक को उपभोक्ता मानकर शिक्षा को केवल सेवा की तरह देखा जाने लगे। बाजार में ग्राहक की संतुष्टि महत्वपूर्ण होती है, लेकिन विद्यालय का काम केवल ग्राहक को खुश करना नहीं है। उसका काम ऐसे मनुष्य तैयार करना है जो असहमति में भी लोकतांत्रिक रहे, सफलता में भी विनम्र रहे, तकनीक का उपयोग करे लेकिन तकनीक का गुलाम न बने और अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों को भी समझे।स्कूलों की उपलब्धियां अक्सर प्रतिशत, रैंक, प्रवेश परीक्षा, विदेशी विश्वविद्यालय, विशाल परिसर और नई तकनीक से मापी जाती हैं। ये उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अधूरी हैं। विद्यालय की असली परीक्षा परीक्षा कक्ष के बाहर होती है। क्या विद्यार्थी झूठ और सुविधा के बीच सही विकल्प चुन सकता है? क्या वह कमजोर व्यक्ति के साथ खड़ा हो सकता है? क्या वह किसी खबर को बिना जांचे स्वीकार नहीं करेगा? क्या वह समाज के प्रति अपने दायित्व को समझेगा? इन सवालों का कोई चमकदार विज्ञापन नहीं बनता, लेकिन राष्ट्र का भविष्य इन्हीं से बनता है।विरोधाभास सामने है। एक तरफ शिक्षा में बड़े निवेश की चर्चा है, दूसरी तरफ 2024-25 में एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे थे और करीब आठ हजार स्कूलों में कोई विद्यार्थी दर्ज नहीं था। देश के 63 प्रतिशत से अधिक स्कूलों तक कंप्यूटर और इंटरनेट की पहुंच जरूर हुई है, लेकिन सुविधा पहुंचना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी नहीं। जहां शिक्षक की कमी या प्रशिक्षण का अभाव है, वहां तकनीक भी अधूरी है।
यही कारण है कि निजी निवेश की बहस को सरकारी शिक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यदि सार्वजनिक विद्यालय कमजोर होते गए और निजी विद्यालय लगातार महंगे होते गए तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा धीरे-धीरे आर्थिक क्षमता से जुड़ जाएगी। फिर समान अवसर का संवैधानिक विचार कमजोर होगा। स्कूल में प्रवेश ही नहीं, क्षमता विकसित करने वाली शिक्षा का अधिकार भी होना चाहिए।राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षा को रटने और परीक्षा केंद्रित व्यवस्था से आगे ले जाने की बात कही गई है। उसमें आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता, कौशल, भारतीय भाषाओं, कला, खेल और समग्र विकास पर जोर है। निजी स्कूल इन लक्ष्यों को गंभीरता से अपनाते हैं तो निवेश का प्रभाव केवल परिसर तक सीमित नहीं रहेगा। लेकिन इसके लिए स्वतंत्र गुणवत्ता मूल्यांकन चाहिए। केवल बोर्ड परिणाम को गुणवत्ता मानना उतना ही गलत है जितना केवल राजस्व को किसी कंपनी की पूरी सफलता मान लेना।निवेशकों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। स्कूल कितना कमाता है, यह उसका एक पहलू है; वह शिक्षक पर कितना खर्च करता है, कितना प्रशिक्षण देता है, कितनी छात्रवृत्ति देता है, कितने बच्चों को खेल और कला का अवसर देता है और कमजोर विद्यार्थियों के लिए क्या व्यवस्था करता है, यह दूसरा पहलू है। फीस की पारदर्शिता, शिक्षक सेवा शर्तें, छात्र सुरक्षा और शिकायत निवारण को भी गुणवत्ता की कसौटी बनाया जाना चाहिए। दिल्ली में निजी स्कूलों की फीस बढ़ोतरी को लेकर 2026 में कानूनी और नियामकीय विवाद इसी व्यापक चिंता को सामने लाता है।
शिक्षा में निवेश को रोकना समाधान नहीं है। समाधान यह है कि पूंजी को दिशा दी जाए और परिणाम को पैसे से न मापा जाए। विद्यालय की पांच पूंजी हो सकती हैं आर्थिक, मानवीय, बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक। आर्थिक पूंजी भवन और तकनीक दे सकती है। मानवीय पूंजी श्रेष्ठ शिक्षक देते हैं। बौद्धिक पूंजी अनुसंधान और जिज्ञासा से बनती है। सामाजिक पूंजी अभिभावकों और समुदाय के विश्वास से आती है। नैतिक पूंजी ईमानदारी, अनुशासन, करुणा और सेवा से बनती है। पहली पूंजी खरीदी जा सकती है; बाकी चार समय, नेतृत्व और संस्कृति से बनती हैं।परीक्षा यह नहीं होगी कि भारत ने स्कूलों में कितने करोड़ रुपये आकर्षित किए। असली सवाल यह होगा कि उन करोड़ों रुपयों ने कितने बेहतर शिक्षक तैयार किए, कितने बच्चों की पहुंच बढ़ाई, कितनी जिज्ञासा जगाई और कितने जिम्मेदार नागरिक बनाए। स्कूल की बैलेंस शीट में मुनाफा बढ़ना बुरी बात नहीं, लेकिन यदि उसी समय बच्चे की जिज्ञासा, संवेदना और स्वतंत्र सोच घट जाए तो यह विकास नहीं, सौदा है।विद्यालय कंपनी की परिसंपत्ति नहीं है। वह जगह है जहां अगली पीढ़ी का चरित्र गढ़ा जाता है। निवेशक पूंजी लगा सकते हैं, सरकार नियम बना सकती है और प्रबंधन व्यवस्था खड़ी कर सकता है, लेकिन शिक्षा की आत्मा शिक्षक और समाज मिलकर बचाते हैं। भारत को ऐसे स्कूल चाहिए जहां प्रयोगशाला के साथ संवेदना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ विवेक और प्रतियोगिता के साथ सहयोग हो। शिक्षा में पैसा जरूर आए, लेकिन उसका सबसे बड़ा लाभांश मुनाफा नहीं, बेहतर मनुष्य और बेहतर नागरिक होना चाहिए।
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