OPINION: शिक्षक पढ़ाए या हर वक्त सफाई देता रहे? जवाबदेही किसकी
राजस्थान के सरकारी स्कूलों को लेकर इन दिनों जो तस्वीर सामने आ रही है, वह सिर्फ शिक्षकों की कमी या खराब भवनों की कहानी नहीं है। इसके भीतर एक और बड़ा सवाल छिपा है आखिर सरकारी स्कूल में होने वाली हर कमी का बोझ शिक्षक के सिर पर कब तक डाला जाएगा? शिक्षक से कहा जाता है कि बच्चों की पढ़ाई बेहतर होनी चाहिए, उपस्थिति पूरी होनी चाहिए, परीक्षा परिणाम अच्छा आना चाहिए और सरकारी योजनाएं भी समय पर लागू होनी चाहिए। दूसरी तरफ अगर स्कूल की इमारत जर्जर है, शिक्षक कम हैं, संसाधन नहीं हैं या बच्चों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, तो इन सवालों का सामना भी अक्सर स्कूल के शिक्षक और प्रधानाचार्य को ही करना पड़ता है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि शिक्षक कितना जवाबदेह है। असली सवाल यह है कि सरकार और शिक्षा विभाग अपनी जवाबदेही का कितना हिस्सा खुद उठा रहे हैं?आज राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था पर बहस इसलिए तेज है क्योंकि सरकारी स्कूलों की जमीनी तस्वीर लगातार सामने आ रही है। बालोतरा के मांगी सिवाना सरकारी वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 12 तक की पढ़ाई एक शिक्षक के भरोसे चलने की खबर सामने आई और छात्र खुद विरोध में उतर गए। यह सिर्फ एक स्कूल की समस्या नहीं मानी जा सकती। जब बच्चे ही यह सवाल उठाने लगें कि उनके स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं हैं, तो समझना चाहिए कि समस्या कागज से निकलकर कक्षा तक पहुंच चुकी है।
जयपुर के बगरू क्षेत्र से सामने आया मामला तो सरकारी स्कूलों की स्थिति पर और बड़ा सवाल खड़ा करता है। रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल की इमारत की हालत खराब होने के कारण बच्चों को भैंसों के बाड़े में पढ़ाई करनी पड़ी। छत से पानी टपकने और भवन की स्थिति खराब होने की बात सामने आई। यह वही सरकारी स्कूल है जहां शिक्षा की जिम्मेदारी शिक्षक निभा रहा है, लेकिन अगर बच्चे के बैठने की जगह तक सुरक्षित नहीं है तो शिक्षक से केवल परिणाम पूछना किस हद तक उचित है?यहीं शिक्षक की समस्या समझने की जरूरत है। शिक्षक से कहा जाता है कि वह बच्चे का भविष्य बनाए, लेकिन उसके पास कई बार वह बुनियादी व्यवस्था ही नहीं होती जिसमें वह अपना काम ठीक से कर सके। अगर कक्षा में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं तो एक शिक्षक को कई कक्षाओं और कई विषयों का बोझ उठाना पड़ता है। अगर भवन की हालत खराब है तो पढ़ाई के साथ बच्चों की सुरक्षा की चिंता भी उसी के सिर रहती है। अगर किसी सरकारी योजना का लक्ष्य पूरा नहीं होता तो विभागीय दबाव आता है। और अगर स्कूल की कोई कमी बाहर दिखाई दे जाए तो सवाल यह भी उठ सकता है कि प्रधानाचार्य और शिक्षक ने व्यवस्था क्यों नहीं सुधारी। क्या शिक्षक को शिक्षक रहने दिया गया है या उसे स्कूल की हर समस्या का जिम्मेदार बना दिया गया है?
इसी संदर्भ में सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और फोटो-वीडियो को लेकर जारी निर्देशों पर बहस को देखना चाहिए। सरकार का पक्ष है कि विद्यार्थियों की निजता और सुरक्षा की रक्षा जरूरी है। यह बात पूरी तरह उचित है। नाबालिग बच्चों की तस्वीरें या वीडियो बिना अनुमति बनाना और उन्हें सार्वजनिक करना किसी भी स्थिति में सामान्य नहीं माना जा सकता। स्कूल में पढ़ाई के दौरान बाहरी लोगों की अनियंत्रित आवाजाही से कक्षा भी प्रभावित हो सकती है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब सुरक्षा के नाम पर निगरानी और पारदर्शिता के रास्ते भी बहुत संकरे हो जाएं।24 अगस्त को जोधपुर में पत्रकार संगठन की ओर से स्कूलों में फोटो और वीडियो पर रोक के खिलाफ ज्ञापन दिया जाना बताता है कि विवाद अब केवल प्रशासनिक आदेश नहीं रह गया है। सवाल यह है कि अगर किसी सरकारी स्कूल की हालत खराब है, बच्चों को सुविधा नहीं मिल रही, शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं या कोई गंभीर प्रशासनिक समस्या है तो उसकी स्वतंत्र तस्वीर और रिपोर्ट सामने कैसे आएगी? सरकार को बच्चों की निजता बचानी चाहिए, लेकिन स्कूल की बदहाली को निजता का नाम देकर छिपाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
यहां एक बेहद साफ फर्क करना होगा। किसी बच्चे की पहचान सार्वजनिक करना और स्कूल की टूटी दीवार की तस्वीर लेना एक बात नहीं है। किसी छात्र की निजी जानकारी रिकॉर्ड करना और स्कूल में शिक्षक की कमी का दस्तावेज बनाना एक बात नहीं है। किसी कक्षा में पढ़ाई बाधित करना और सरकारी स्कूल की आधारभूत स्थिति की रिपोर्टिंग करना भी एक बात नहीं है। नियम अगर इन सभी स्थितियों को एक ही नजर से देखेंगे तो उनका उद्देश्य ही कमजोर हो जाएगा।सरकार को एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें बच्चों की सुरक्षा पूरी तरह सुरक्षित रहे और स्कूल की जवाबदेही भी बनी रहे। उदाहरण के लिए किसी पत्रकार या अधिकृत निरीक्षण दल को स्कूल में प्रवेश के लिए अनुमति की स्पष्ट प्रक्रिया दी जा सकती है। बच्चों के चेहरे और व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक करने पर रोक हो सकती है। संवेदनशील स्थानों की रिकॉर्डिंग प्रतिबंधित की जा सकती है। लेकिन अगर कोई स्कूल भवन जर्जर है, शिक्षक नहीं हैं या कोई गंभीर सुविधा नहीं है तो उसकी रिपोर्टिंग को रोकने का रास्ता नहीं होना चाहिए। सरकार को स्कूल की तस्वीर से डरने के बजाय उस तस्वीर को बदलने पर ध्यान देना चाहिए।
क्योंकि अगर किसी स्कूल की हालत अच्छी है तो उसकी तस्वीर सरकार की उपलब्धि होगी। अगर स्कूल में शिक्षक पर्याप्त हैं, बच्चे नियमित पढ़ रहे हैं, प्रयोगशाला चल रही है और सुविधाएं बेहतर हैं तो स्वतंत्र रिपोर्टिंग से सरकार की ही छवि मजबूत होगी। समस्या तब होती है जब व्यवस्था अपनी कमियों को स्वीकार करने के बजाय कमियां दिखाने वाले पर सवाल उठाने लगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आईना तोड़ने से चेहरा बेहतर नहीं होता।शिक्षक के संदर्भ में यह बात और महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षक को बच्चों की पढ़ाई के लिए जवाबदेह होना चाहिए, इसमें कोई विवाद नहीं। अगर शिक्षक स्कूल में नहीं आता, कक्षा नहीं लेता या अपने कर्तव्य में लापरवाही करता है तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जिस समस्या का समाधान शिक्षक के हाथ में नहीं है, उसके लिए उसे जिम्मेदार ठहराना गलत है। शिक्षक स्कूल की इमारत नहीं बनाता। शिक्षक रिक्त पदों पर भर्ती नहीं करता। शिक्षक बजट तय नहीं करता। शिक्षक यह तय नहीं करता कि किसी स्कूल में प्रयोगशाला होगी या नहीं। फिर हर कमी की जिम्मेदारी शिक्षक पर क्यों?
राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था को इस समय जिम्मेदारी और जवाबदेही के बीच अंतर समझने की जरूरत है। शिक्षक की जिम्मेदारी पढ़ाना है। प्रधानाचार्य की जिम्मेदारी स्कूल का प्रशासन देखना है। शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी पर्याप्त शिक्षक, संसाधन और निगरानी उपलब्ध कराना है। सरकार की जिम्मेदारी बजट, नीति और व्यवस्था को मजबूत करना है। जब यह पूरा ढांचा अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाएगा तभी शिक्षक से परिणाम मांगना न्यायसंगत होगा।आज सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की स्थिति भी बदल रही है। वे अब सवाल पूछ रहे हैं। बालोतरा में छात्रों का खुद धरने पर बैठना इसी बदलाव का संकेत है। वे पूछ रहे हैं कि शिक्षक क्यों नहीं हैं, सुविधाएं क्यों नहीं हैं और उनकी पढ़ाई को गंभीरता से क्यों नहीं लिया जा रहा। यह बदलाव सरकार के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। अगर बच्चे अपनी शिक्षा के अधिकार को लेकर आवाज उठा रहे हैं तो सरकार को उनकी आवाज सुननी चाहिए, न कि केवल उसे प्रशासनिक समस्या मानना चाहिए।
शिक्षक भी इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन सबसे कमजोर हिस्सा भी वही बनता जा रहा है। उससे उम्मीद सबसे ज्यादा है, जबकि निर्णय लेने की शक्ति सीमित है। उसे परिणाम चाहिए तो शिक्षक को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन संसाधन चाहिए तो फैसला कहीं और होता है। उसे बच्चों की उपस्थिति बढ़ानी है, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति पर उसका नियंत्रण नहीं। उसे परीक्षा परिणाम बेहतर करना है, लेकिन कई बार विषयवार शिक्षक तक उपलब्ध नहीं। उसे सरकारी योजनाएं लागू करनी हैं, लेकिन समय और मानव संसाधन सीमित हैं।यह स्थिति लंबे समय तक चलेगी तो इसका असर सिर्फ शिक्षक पर नहीं पड़ेगा। सबसे बड़ा नुकसान बच्चों का होगा। थका हुआ शिक्षक, लगातार प्रशासनिक दबाव में काम करता शिक्षक और संसाधनों की कमी से जूझता शिक्षक उस गुणवत्ता की शिक्षा नहीं दे सकता जिसकी सरकार उससे उम्मीद कर रही है। शिक्षक को सुविधा देना किसी कर्मचारी को सुविधा देना भर नहीं है। यह सीधे बच्चे की पढ़ाई में निवेश है।
इसलिए राजस्थान सरकार को स्कूलों की निगरानी पर बने नियमों की समीक्षा करते समय तीन चीजों का संतुलन बनाना होगा बच्चों की निजता, स्कूल की सुरक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही। किसी बाहरी व्यक्ति को बिना अनुमति स्कूल में घुसने की छूट नहीं होनी चाहिए, लेकिन अधिकृत जांच और पत्रकारिता के लिए पारदर्शी रास्ता जरूर होना चाहिए। इसी तरह शिक्षक को जवाबदेह बनाया जाए, लेकिन उसके अधिकार और संसाधन भी सुनिश्चित किए जाएं।सरकारी स्कूल जनता की संपत्ति हैं। वहां पढ़ने वाले बच्चे जनता के भविष्य हैं और वहां काम करने वाला शिक्षक उस भविष्य को तैयार करने वाला व्यक्ति है। इसलिए सरकार को शिक्षक से हर सवाल का जवाब मांगने से पहले यह भी देखना होगा कि उसे काम करने के लिए क्या दिया गया है।शिक्षक को कक्षा में खड़ा करके उससे पूरे स्कूल की व्यवस्था का हिसाब मांगना आसान है। मुश्किल यह पूछना है कि व्यवस्था ने शिक्षक को पढ़ाने के लिए दिया क्या?राजस्थान के सरकारी स्कूलों में अब यही सवाल सबसे जरूरी है। शिक्षक को पढ़ाने दीजिए, बच्चों को सुरक्षित रखिए, स्कूल की कमियां छिपाइए मत और जिस अधिकारी या विभाग की जिम्मेदारी है, उससे भी जवाब मांगिए। क्योंकि शिक्षा व्यवस्था तब मजबूत होगी जब जवाबदेही सिर्फ सबसे नीचे खड़े शिक्षक की नहीं होगी।शिक्षक हर सवाल का जवाब देने के लिए नहीं, बच्चों को जवाब देने लायक बनाने के लिए स्कूल में आता है। सरकार को यह फर्क समझना ही होगा।
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