शिक्षा का मंदिर नहीं किताबों का कारोबार बन गए हैं प्राइवेट स्कूल, पढ़ाई के नाम पर कैसे लगा रहे चूना?
NCERT Book Price: प्राइवेट स्कूल किताब के नाम पर वसूली कर रहे हैं. ये बच्चों की पीठ पर बोझ बढ़ा रहे हैं और आपकी जेब हल्की कर रहे हैं. NCERT की एक किताब अगर 65 रुपए की मिल रही है तो वैसी ही दूसरी किताब जिसे किसी प्राइवेट पब्लिशर ने छापा है वो प्राइवेट स्कूल 650 रुपए में जबरन बेच रहे हैं और आपको मजबूर होकर इसे खरीदना पड़ रहा है. एक जैसी दो किताबों के दाम में सीधे 10 गुना का फर्क है. जो प्राइवेट पब्लिशर की किताब है, उसमें कोई अतिरिक्त जानकारी नहीं है. कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे उस किताब की ज्यादा कीमत होने को जस्टिफाई किया जा सके. ये किताबें सिर्फ महंगी ही नहीं हैं, बल्कि उसमें अशुद्धियों की मात्रा भी ज्यादा है.
किताबों के नाम पर जेब खाली कर रहा NCERT
यूनान के प्रसिद्ध विद्वान अरस्तू ने कहा है कि संसार में जितनी भी उपलब्धियां हैं, शिक्षा उन सबसे बढ़कर है. मनुष्य की इस सबसे बड़ी उपलब्धि को आम लोगों तक पहुंचने से रोकने के लिए प्राइवेट स्कूलों ने महंगाई को हथियार बनाया है. आज से स्कूलों में नया एकेडमिक सेशन शुरू हो गया है. सोचिए दो बच्चों के लिए किताब खरीदने में किसी के 14 हजार रुपए खर्च हुए तो किसी को 12 हजार रुपए खर्च करने पड़े. क्या स्कूल बैग अब आर्थिक बोझ का प्रतीक बन गया है? CBSE से मान्यता प्राप्त स्कूलों के लिए पहली से 12वीं क्लास तक NCERT तय सिलेबस के मुताबिक किताबें प्रकाशित करती है. सरकारी स्कूलों में NCERT की किताबें ही पढ़ाई जाती है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों ने मुनाफे के लिए एक चोर दरवाजा खोज लिया. प्राइवेट स्कूलों में सिलेबस तो NCERT का होता है. NCERT की किताबों का सेट भी छात्रों को दिया जाता है. लेकिन उसके साथ ही छात्रों को प्राइवेट पब्लिशर्स की किताब भी जबरन थमा दी जाती हैं. प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें भी NCERT के सिलेबस को ही कवर करती हैं, लेकिन इनकी कीमत NCERT की किताबों के मुकाबले 10 गुना तक ज्यादा होती है
व्यापार बना शिक्षा
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा है कि शिक्षा को व्यापार नहीं बनाना चाहिए, यह आत्मा के विकास का साधन है. आत्मा के विकास के साधन को प्राइवेट स्कूलों ने शुद्ध व्यापार बना दिया है. ये ठगी की सालाना EMI है जो हम हर साल मार्च या अप्रैल के महीने से भरना शुरू करते हैं. निजी स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की जो किताबें 10 गुना दाम पर बेचते हैं उनकी गुणवत्ता क्या NCERT से अच्छी होती है. उनमें क्या कुछ अतिरिक्त जानकारी होती है. जवाब है नहीं. फिर प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें क्यों बच्चों को जबरन पढ़ाई जा रही है. 1961 में NCERT को बनाया ही इसलिए गया था कि ये एजेंसी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए शोध करेगी और सिलेबस के मुताबिक किताबें छापेगी. 2024-25 में NCERT का सालाना बजट 510 करोड़ रुपए था. ये संस्था करीब 100 करोड़ रुपए सिर्फ रिसर्च पर खर्च करती है. ये खर्च इसलिए किया जाता है ताकि स्कूल में पढ़ने वाले करोड़ों बच्चों को कम कीमत में ज्यादा बेहतर और ज्ञानवर्धक किताबें मिल सके. NCERT की जिन किताबों को निजी स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबों से रिप्लेस करते हैं, उन्हें हर विषय के एक्सपर्ट लिखते हैं. आठवीं की NCERT के इतिहास की किताब देश के जाने-माने इतिहासकारों का पैनल लिखेगा. ऐसे विशेषज्ञों के ज्ञान पर प्राइवेट पब्लिशर की वो किताब भारी पड़ रही है जिसका लेखक इतिहास में मास्टर डिग्री लेने वाला कोई व्यक्ति होगा. ऐसा क्यों है. इसकी वजह है ठगी, लालच और मुनाफा. ये सामान्य ठगी नहीं है. शिक्षा के नाम पर ये ठगी संगठित और बहुत बड़ी है.
किताबों का कारोबार
देश में किताबों का कुल कारोबार 42 हजार करोड़ रुपए का है. इसमें NCERT और राज्य सरकारों की एजेंसियों के किताबों की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत है. स्कूली किताबों के बाजार में प्राइवेट पब्लिशर्स की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत है. NCERT और राज्य सरकारों की प्रकाशन एजेंसियां पूरे साल में करीब 14 हजार करोड़ की किताबें बेचती हैं, जबकि प्राइवेट पब्लिशर्स पूरे साल में करीब 28 हजार करोड़ से ज्यादा की किताब बेचते हैं. देश में हर साल करीब 300 करोड़ स्कूली किताबें प्रिंट होती हैं. इसमें बड़ा हिस्सा प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबों का होता है. अब सवाल है कि जब गुणवत्ता में NCERT की किताबें अच्छी हैं, फिर स्कूली किताबों के बाजार में प्राइवेट पब्लिशर्स का हिस्सा ज्यादा क्यों हैं. इसकी वजह है लालच और मुनाफा. देश में करीब 15 लाख स्कूल हैं. इसमें से करीब 70 प्रतिशत सरकारी स्कूल हैं. वहीं करीब 23 प्रतिशत प्राइवेट स्कूल हैं.
2024-25 के एकेडमिक वर्ष में सरकारी स्कूलों में 15 करोड़ यानी 61 प्रतिशत बच्चे पढ़ते थे. वहीं प्राइवेट स्कूलों में करीब साढ़े 9 करोड़ यानी 39 प्रतिशत बच्चे पढ़ते थे. प्राइवेट स्कूल कम हैं. इनमें पढ़नेवाले बच्चे कम हैं. लेकिन देश में प्राइवेट स्कूलों का सालाना कारोबार करीब 5 लाख करोड़ रुपए का है. ये रकम बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात जैसे राज्यों के वार्षिक बजट से ज्यादा है. प्राइवेट स्कूल कम हैं. इनमें पढ़ने वाले छात्र भी कम हैं. लेकिन इनका सालाना कारोबार कई राज्यों के वार्षिक बजट से ज्यादा है. ये सारा पैसा हमारी आपकी जेब से गया है. पहले तो इन स्कूलों की फीस महंगी होती है. इनकी फीस पर कोई कंट्रोल नहीं है. ऊपर से, ये प्राइवेट पब्लिशर्स की महंगी किताबें बेचकर भी मोटा मुनाफा कमाते हैं. दरअसल इन महंगी किताबों को बेचने से होनेवाले मुनाफे में प्राइवेट स्कूलों का मोटा कमिशन होता है. इसी मुनाफे के लालच में प्राइवेट स्कूल आम आदमी की मजबूरी को अपनी आर्थिक मजबूती में बदलते हैं.
प्राइवेट स्कूल के नाम पर लूटमार
कई बार चाहकर भी लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ा पाते क्योंकि सरकारी स्कूलों के पास इतना इंफ्रास्ट्रक्चर भी नहीं होता कि वो सभी बच्चों को पढ़ा पाएं. इसका फायदा ये प्राइवेट स्कूल उठाते हैं. दिल्ली से देहरादून तक प्राइवेट स्कूलों की ठगी का मॉडल एक है, लेकिन बड़े शहरों में वसूली भी बड़ी है. इसे ऐसे समझिए एक बच्चे को पढ़ाने पर सरकारी स्कूलों में एक साल का खर्च औसतन 2 हजार से 8 हजार रुपए होता है. छोटे शहर के प्राइवेट स्कूल में ये खर्च बढ़कर 50 हजार से 2 लाख रुपए तक हो जाता है. भोपाल, लखनऊ, पटना जैसे शहरों में ये खर्च बढ़कर 1 से 4 लाख रुपए तक का हो जाता है. वहीं दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में एक बच्चे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का सालाना खर्च 6 लाख रुपए तक है. कई बार ये 6 लाख रुपए से भी ज्यादा हो जाता है.
बच्चों को मिल रही गलत जानकारी
अगर एक औसत भारतीय परिवार अपने एक बच्चे को किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना चाहता है तो उसे अपनी आय का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा खर्च करना होगा. अच्छी शिक्षा के नाम पर प्राइवेट स्कूल हमारी कमाई का 40 प्रतिशत तक वसूल लेते हैं. इस खर्च में किताबें छोटा हिस्सा है. प्राइवेट स्कूल सिर्फ महंगी किताब ही नहीं बेच रहे हैं. वो बच्चों को गलत जानकारी भी दे रहे हैं. दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने कहा है कि शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं. हमारे देश में शिक्षा के नाम पर प्राइवेट स्कूल क्या कर रहे हैं. महंगी फीस वसूल रहे हैं. महंगी किताब बेच रहे हैं. और बच्चों को गलत जानकारी दे रहे हैं. ये आपके-हमारे पूरे देश के वर्तमान और भविष्य से जुड़ा मुद्दा है. ये ज्ञान और अर्थ दोनों से जुड़ा मामला है. ऐसे में राष्ट्र का भविष्य बनाने वाले इस सिस्टम को दुरुस्त किया जाना चाहिए. नियम बनाए जाने चाहिए. ताकि प्राइवेट स्कूल आम आदमी की जेब न काट सकें और बच्चों की सही, सस्ती और अच्छी शिक्षा दें.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें