Allahabad High Court Order: 15 सहायक शिक्षकों को राहत, आईटीआई फोरमैन अनुदेशक भर्ती पर भी रोक
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में शिक्षकों और तकनीकी शिक्षा से जुड़ी भर्ती के दो महत्वपूर्ण मामलों में अहम आदेश दिया है। मऊ जिले के सहायता प्राप्त विद्यालयों में कार्यरत 15 सहायक शिक्षकों को कोर्ट से राहत मिली है। अदालत ने कहा कि केवल सरकारी कार्यालय में नियुक्ति से संबंधित अभिलेख नहीं मिलने के आधार पर किसी शिक्षक की नियुक्ति को फर्जी या धोखाधड़ी से प्राप्त नियुक्ति नहीं माना जा सकता। वहीं दूसरे मामले में हाईकोर्ट ने राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों यानी आईटीआई में फोरमैन अनुदेशक के पदों को आउटसोर्सिंग के माध्यम से भरने वाले 24 जून 2026 के शासनादेश पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है।
मऊ के 15 सहायक शिक्षकों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत
मऊ जिले के सहायता प्राप्त विद्यालयों में नियुक्त 15 सहायक शिक्षकों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर उनके खिलाफ की गई कार्रवाई को चुनौती दी थी। रजनीश उपाध्याय और 14 अन्य शिक्षकों की ओर से दाखिल याचिका में वेतन रोकने तथा नियुक्तियों को फर्जी बताकर की गई कार्रवाई पर सवाल उठाया गया था।याचियों के अनुसार उनकी नियुक्तियां वर्ष 2010 से 2016 के बीच सहायता प्राप्त विद्यालयों में हुई थीं। नियुक्तियों को तत्कालीन जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से अनुमोदन मिला था। इसके बाद शिक्षक लगातार अपने पद पर कार्य करते रहे और उन्हें विभाग की ओर से वेतन का भुगतान भी किया जाता रहा।मामला उस समय सामने आया जब विभागीय जांच के दौरान नियुक्तियों से संबंधित कुछ अभिलेख सरकारी कार्यालय में उपलब्ध नहीं मिले। इसके आधार पर शिक्षकों की नियुक्तियों पर सवाल उठाते हुए उनके खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई की गई और वेतन रोकने की कार्रवाई भी की गई।
वर्ष 2025 की जांच में नहीं मिले नियुक्ति संबंधी अभिलेख
वर्ष 2025 में हुई विभागीय जांच के दौरान अधिकारियों को शिक्षकों की नियुक्ति के अनुमोदन से संबंधित दस्तावेज नहीं मिले। विभाग ने इसी आधार पर नियुक्तियों को संदिग्ध मानते हुए कार्रवाई की।शिक्षकों की ओर से कोर्ट में कहा गया कि इससे पहले वर्ष 2018 में भी उनकी नियुक्तियों की जांच की गई थी। उस जांच में नियुक्तियों को सही पाया गया था। याचियों ने यह भी बताया कि पुलिस की ओर से की गई विवेचना में भी उनके खिलाफ धोखाधड़ी का मामला साबित नहीं हुआ था।शिक्षकों का तर्क था कि कई वर्षों तक सेवा लेने और वेतन का भुगतान करने के बाद केवल सरकारी कार्यालय में पुराने दस्तावेज नहीं मिलने के आधार पर उनकी नियुक्तियों को फर्जी नहीं कहा जा सकता।
अभिलेख नहीं मिलने को फर्जी नियुक्ति का आधार नहीं माना जा सकता
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की अदालत में हुई। कोर्ट ने कहा कि सरकारी कार्यालय में किसी नियुक्ति से संबंधित अभिलेख का उपलब्ध नहीं होना प्रशासनिक स्तर की कमी या लापरवाही हो सकती है। लेकिन केवल इसी आधार पर संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति को फर्जी या धोखाधड़ीपूर्ण नहीं माना जा सकता।अदालत ने यह भी माना कि किसी कर्मचारी के खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाना जरूरी है। बिना नोटिस और सुनवाई के वेतन रोकने की कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।हाईकोर्ट ने शिक्षकों के खिलाफ जारी संबंधित प्रतिकूल रिपोर्टों और आदेशों को निरस्त कर दिया। हालांकि कोर्ट ने विभाग को कानून के अनुसार नए सिरे से जांच करने की छूट दी है।
नई जांच में शिक्षकों को दस्तावेज देने का मिलेगा मौका
अदालत के आदेश के अनुसार यदि विभाग मामले की दोबारा जांच करता है तो प्रत्येक शिक्षक को अपना पक्ष रखने का अवसर देना होगा। शिक्षक नियुक्ति से संबंधित उपलब्ध दस्तावेज और अन्य साक्ष्य भी विभाग के सामने प्रस्तुत कर सकेंगे।इसका मतलब यह नहीं है कि नियुक्तियों की जांच हमेशा के लिए समाप्त हो गई है। कोर्ट ने केवल यह स्पष्ट किया है कि कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार होनी चाहिए।
आईटीआई में फोरमैन अनुदेशक की आउटसोर्सिंग भर्ती पर रोक
दूसरे मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में फोरमैन अनुदेशक के पदों को आउटसोर्सिंग के माध्यम से भरने के सरकार के फैसले पर रोक लगा दी है।यह मामला अखिलेश कुमार सिंह की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुनील कुमार और वीरेंद्र कुमार गौतम ने अदालत के सामने पक्ष रखा।
याचिका में कहा गया कि 24 जून 2026 को सरकार की ओर से शासनादेश जारी कर फोरमैन अनुदेशक के पदों को आउटसोर्सिंग के माध्यम से भरने की मंजूरी दी गई। याचिकाकर्ता का दावा था कि यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (अनुदेशक और फोरमैन अनुदेशक) सेवा नियमावली, 2021 के प्रावधानों के विपरीत है।
सेवा नियमावली से अलग शासनादेश जारी करने पर कोर्ट का सवाल
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकारी पक्ष से पूछा कि क्या लागू वैधानिक सेवा नियमावली को दरकिनार करते हुए शासनादेश जारी किया जा सकता है।सरकारी पक्ष की ओर से इस सवाल पर स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा सका। इसके बाद अदालत ने सेवा नियमावली और शासनादेश के बीच कानूनी स्थिति पर विचार किया।कोर्ट ने कहा कि कोई भी शासनादेश लागू वैधानिक नियमों को खत्म या उनके विपरीत नहीं जा सकता। कार्यपालिका के आदेश के माध्यम से सेवा नियमावली में निर्धारित भर्ती प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
24 जून 2026 के शासनादेश पर अगले आदेश तक रोक
हाईकोर्ट ने 24 जून 2026 को जारी विवादित शासनादेश को अगले आदेश तक स्थगित रखने का निर्देश दिया है। इसका सीधा असर आईटीआई में फोरमैन अनुदेशक के पदों को आउटसोर्सिंग के माध्यम से भरने की प्रक्रिया पर पड़ेगा।हालांकि अदालत ने विभाग को सेवा नियमावली के अनुसार नियमित भर्ती प्रक्रिया जारी रखने की छूट दी है। यानी फोरमैन अनुदेशक के पदों पर भर्ती का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। विभाग नियमों के तहत भर्ती की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।कोर्ट ने राज्य सरकार को याचिका पर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता को प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है।
भर्ती अभ्यर्थियों के लिए आगे क्या होगा
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद फोरमैन अनुदेशक भर्ती से जुड़े अभ्यर्थियों की नजर अब राज्य सरकार के जवाब और आगे होने वाली सुनवाई पर रहेगी। आउटसोर्सिंग के माध्यम से पद भरने संबंधी शासनादेश पर फिलहाल रोक है, जबकि नियमावली के तहत नियमित भर्ती का रास्ता खुला रखा गया है।मऊ के शिक्षकों के मामले में भी विभाग को अब यदि जांच करनी है तो निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। शिक्षकों को नोटिस देकर उनका पक्ष सुनना और उपलब्ध दस्तावेजों पर विचार करना जरूरी होगा।दोनों मामलों में हाईकोर्ट के आदेशों से यह स्पष्ट हुआ है कि सरकारी नियुक्तियों और भर्ती प्रक्रियाओं में केवल प्रशासनिक आदेश या अभिलेखों की उपलब्धता ही पर्याप्त आधार नहीं हो सकती। नियुक्ति से जुड़े विवाद में साक्ष्यों की जांच और संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देना जरूरी है। वहीं भर्ती के मामले में लागू वैधानिक सेवा नियमावली के अनुरूप प्रक्रिया अपनाना आवश्यक है।
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