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बुधवार, 23 सितंबर 2026

इमरान मसूद का अखिलेश पर वार, इकरा हसन का पलटवार; 2027 में क्या होगा गठबंधन?



इमरान मसूद का अखिलेश पर वार, इकरा हसन का पलटवार; 2027 में क्या होगा गठबंधन?

उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन चुनावी बिसात पर मोहरे तेजी से सजने लगे हैं। सबसे ज्यादा नजर उस गठबंधन पर है जिसने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीति का समीकरण ही बदल दिया था। अखिलेश यादव और राहुल गांधी की जोड़ी ने तब साथ मिलकर चुनाव लड़ा और समाजवादी पार्टी ने राज्य की 80 लोकसभा सीटों में 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में प्रदर्शन किया, जबकि कांग्रेस के खाते में 6 सीटें आईं। लेकिन दो साल पहले जो जोड़ी मंच पर एक-दूसरे का हाथ थामे दिखाई दे रही थी, उसके सामने अब सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि सीटों का बंटवारा और दोनों दलों के नेताओं की बढ़ती बयानबाजी बनती दिखाई दे रही है। 23 सितंबर 2026 को सहारनपुर में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और सपा सांसद इकरा हसन के बीच जिस तरह गठबंधन को लेकर आमने-सामने बयान आए, उसने इस बहस को और हवा दे दी है।इमरान मसूद का तर्क है कि भाजपा के खिलाफ बड़ी लड़ाई कांग्रेस को साथ लेकर ही लड़ी जा सकती है और गठबंधन को लेकर फैसला जल्द होना चाहिए। दूसरी तरफ इकरा हसन ने पलटकर कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में समाजवादी पार्टी ही है। यानी विवाद अब केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि दोनों दल अपने-अपने राजनीतिक वजन को साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। यही वह बिंदु है जहां 2027 का गठबंधन बेहद दिलचस्प हो जाता है। क्योंकि जब सहयोगी दल एक-दूसरे से यह पूछने लगें कि भाजपा से लड़ने की असली ताकत किसके पास है, तब सवाल सीटों से आगे निकलकर नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव तक पहुंच जाता है।

लेकिन इस पूरे विवाद को अभी गठबंधन टूटने का संकेत मान लेना जल्दबाजी होगी। राजनीति में सहयोगी दलों के नेता अक्सर अपनी-अपनी बातचीत की जमीन मजबूत करने के लिए सार्वजनिक बयान देते हैं। अंतिम फैसला शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर होता है। यही वजह है कि सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने भी संकेत दिया है कि अलग-अलग नेताओं की बयानबाजी से ज्यादा महत्व अखिलेश यादव और कांग्रेस नेतृत्व के बीच होने वाली बातचीत का है। यानी नीचे से तलवारें खिंची दिखाई दे सकती हैं, लेकिन ऊपर की मेज पर अभी समझौते की गुंजाइश खत्म हुई है, ऐसा कोई पक्का संकेत नहीं है।फिर सवाल उठता है कि जब दोनों दल 2024 के अनुभव से जानते हैं कि साथ आने से उन्हें राजनीतिक लाभ मिला था, तो फिर तनाव आखिर क्यों है? इसका जवाब सीधे सीटों के गणित में छिपा है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं और कांग्रेस इस बार अपने लिए पिछली तुलना में बड़ा हिस्सा चाहती है। अलग-अलग रिपोर्टों में कांग्रेस की ओर से 100 से अधिक सीटों की दावेदारी की चर्चा सामने आई है, जबकि सपा खेमे में इतनी बड़ी संख्या में सीटें छोड़ने को लेकर सहमति नहीं दिखाई देती। सितंबर 2026 की रिपोर्टों के मुताबिक दोनों दलों ने सभी 403 विधानसभा सीटों पर सर्वे कराया है और सीट बंटवारे पर बातचीत आगे बढ़ाने की तैयारी है।

यही सर्वे अब दोनों पार्टियों की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। कांग्रेस अपने सर्वे के आधार पर कह सकती है कि उसके पास कई सीटों पर मजबूत संगठन और सामाजिक आधार है। सपा अपने सर्वे के आधार पर कह सकती है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उसकी जमीन पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है। दोनों के पास अपने-अपने आंकड़े होंगे और दोनों उन्हीं आंकड़ों से सीटों का दावा तैयार करेंगे। असली टकराव यहीं होना है। कांग्रेस के लिए ज्यादा सीटें केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश में अपने संगठन को दोबारा खड़ा करने का अवसर हैं। सपा के लिए ज्यादा सीटें इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अखिलेश यादव अपनी पार्टी को विपक्ष की केंद्रीय ताकत के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।2024 का लोकसभा चुनाव इस विवाद में दोनों पक्षों को अपने पक्ष में आंकड़े रखने का मौका देता है। उत्तर प्रदेश में सपा 37 और कांग्रेस 6 सीटें जीतकर मजबूत प्रदर्शन करने में सफल रही थीं। विधानसभा क्षेत्रों में लोकसभा चुनाव के परिणाम को देखने पर भी इंडिया गठबंधन ने बड़ी संख्या में क्षेत्रों में बढ़त बनाई थी। हालांकि लोकसभा की विधानसभा-वार बढ़त को सीधे 2027 विधानसभा चुनाव का परिणाम मानना सही नहीं होगा, लेकिन इतना जरूर है कि 2024 ने दोनों दलों को यह दिखा दिया कि भाजपा के खिलाफ संयुक्त लड़ाई का एक चुनावी मॉडल काम कर सकता है। अब सवाल यह है कि क्या उसी मॉडल को अलग मुद्दों, अलग उम्मीदवारों और अलग चुनावी परिस्थितियों में दोहराया जा सकता है।

यहीं अखिलेश यादव की रणनीति कांग्रेस से अलग होती दिखाई देती है। समाजवादी पार्टी अब केवल गठबंधन की घोषणा के भरोसे नहीं बैठना चाहती। पार्टी 403 सीटों पर अपनी तैयारी कर रही है और कई सीटों पर संगठन तथा संभावित उम्मीदवारों का आकलन कर रही है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अखिलेश बातचीत की मेज पर कमजोर स्थिति में नहीं जाना चाहते। यदि पहले ही सीटों की संख्या तय कर दी जाए और फिर संगठन तैयार किया जाए तो पार्टी के पास विकल्प सीमित हो सकते हैं। इसके उलट यदि सपा हर सीट पर तैयारी रखती है तो गठबंधन होने की स्थिति में भी वह अपनी शर्तों को मजबूती से रख सकती है।कांग्रेस की चिंता भी समझने योग्य है। यदि सीटों का फैसला बहुत देर से होता है तो पार्टी के पास उम्मीदवारों और संगठन को जमीन पर उतारने के लिए कम समय बचेगा। यही कारण है कि कांग्रेस के भीतर समय रहते सीट बंटवारा तय करने की आवाजें उठ रही हैं। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने भी कहा था कि प्रदेश संगठन की टीम बनने के बाद सपा के साथ सीट बंटवारे पर बातचीत होगी। इसका मतलब है कि बातचीत का रास्ता बंद नहीं है, बल्कि अभी उसकी औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़नी बाकी है।

लेकिन इस कहानी में पश्चिम बंगाल का उदाहरण अचानक इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि वहां तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के रिश्तों की राजनीति ने अलग तस्वीर दिखाई है। नंदीग्राम उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार वापस लिया और कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करने का फैसला किया। 6 अक्टूबर को मतदान होना है। यह घटनाक्रम दिखाता है कि चुनावी राजनीति में प्रतिद्वंद्विता और रणनीतिक सहयोग एक साथ चल सकते हैं। कल तक जो दल एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई दें, वे किसी खास सीट या परिस्थिति में एक-दूसरे का समर्थन भी कर सकते हैं।इसलिए उत्तर प्रदेश में भी आज की बयानबाजी को कल के गठबंधन का अंतिम फैसला मानना ठीक नहीं होगा। इमरान मसूद कुछ कहते हैं, इकरा हसन पलटवार करती हैं, सपा के दूसरे नेता कांग्रेस पर निशाना साधते हैं और कांग्रेस के नेता सपा के राजनीतिक वजन पर सवाल उठाते हैं लेकिन अंतिम तस्वीर अखिलेश यादव और कांग्रेस नेतृत्व की बातचीत से ही बनेगी। यही कारण है कि फिलहाल सार्वजनिक बयान जितना शोर पैदा कर रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण बंद कमरे में होने वाली सीटों की बातचीत होगी।

सपा के सामने एक और चुनौती है। अगर कांग्रेस को बहुत कम सीटें मिलती हैं तो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा हो सकता है और 2024 जैसी संयुक्त चुनावी मेहनत कमजोर पड़ सकती है। दूसरी तरफ अगर कांग्रेस को बहुत बड़ी संख्या में सीटें दे दी जाती हैं तो सपा के भीतर सवाल उठ सकते हैं कि जिन सीटों पर पार्टी अपना संगठन मजबूत कर चुकी है, वहां सहयोगी को मौका क्यों दिया गया। यानी दोनों दलों के सामने एक ऐसा संतुलन है जहां जीतने योग्य सीटों की पहचान, कार्यकर्ताओं की भावनाएं और गठबंधन का राजनीतिक संदेश तीनों को एक साथ साधना होगा।यहीं 2027 का सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है क्या अखिलेश यादव राहुल गांधी के साथ फिर वही चुनावी मंच साझा करेंगे? मौजूदा परिस्थितियों में इसका निश्चित जवाब देना संभव नहीं है। लेकिन यह जरूर दिखाई दे रहा है कि दोनों दलों ने गठबंधन की संभावना को अभी खत्म नहीं किया है। सपा और कांग्रेस दोनों 2027 को लेकर अपनी तैयारी कर रहे हैं और दोनों के नेताओं के स्तर पर सीट बंटवारे की बातचीत की बात सामने आती रही है। इसलिए आज की बयानबाजी को अंतिम टूट के बजाय बढ़ती सौदेबाजी और राजनीतिक दबाव के हिस्से के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

साथ ही, 2027 का चुनाव केवल सपा और कांग्रेस के रिश्ते से तय नहीं होगा। भाजपा के सामने सत्ता बनाए रखने की चुनौती है, सपा पीडीए के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी संगठनात्मक जमीन बढ़ाना चाहती है और दूसरे दल भी अपनी भूमिका तलाश रहे हैं। हाल में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह की अखिलेश यादव से मुलाकात के बाद सपा-आप के संभावित तालमेल को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज हुई है। इससे संकेत मिलता है कि 2027 से पहले विपक्षी राजनीति का दायरा केवल सपा-कांग्रेस तक सीमित नहीं रहने वाला।इस पूरी राजनीति में सबसे दिलचस्प बात यह है कि 2024 की सफलता दोनों दलों को जोड़ती भी है और अलग-अलग महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाती भी है। कांग्रेस कह सकती है कि उसके साथ आने से राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ बड़ा संदेश गया। सपा कह सकती है कि उत्तर प्रदेश में असली चुनावी ताकत उसके पास थी और कांग्रेस को मिली सीटें भी उसी व्यापक सामाजिक गठजोड़ का हिस्सा थीं। दोनों दावों में अपने-अपने राजनीतिक तर्क हैं। लेकिन 2027 में जनता इन्हीं दावों को नहीं, बल्कि स्थानीय उम्मीदवार, सरकार के कामकाज, विपक्ष की एकजुटता, सामाजिक समीकरण और चुनावी मुद्दों को देखकर फैसला करेगी।

अभी की तस्वीर में सबसे बड़ा संकट गठबंधन टूटने का नहीं, बल्कि गठबंधन की कीमत तय करने का है। कांग्रेस ज्यादा सीटें चाहती है ताकि उसका संगठन और राजनीतिक प्रभाव बढ़े। सपा ज्यादा सीटें अपने पास रखना चाहती है ताकि वह चुनाव की कमान अपने हाथ में रख सके। दोनों को यह भी पता है कि अलग-अलग लड़ने पर वोटों के बंटवारे का जोखिम पैदा हो सकता है, जबकि साथ आने पर सीटों की अदला-बदली और नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं को साधना पड़ेगा। यही वह गांठ है जिसे अखिलेश यादव और राहुल गांधी को खोलना होगा।इसलिए यूपी में अभी जो तलवारें खिंची दिखाई दे रही हैं, उन्हें देखकर यह मान लेना कि अखिलेश और राहुल की जोड़ी खत्म हो गई, जल्दबाजी होगी। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि 2024 जैसी सहज तस्वीर अब नहीं है। इस बार दोनों दल अपने-अपने राजनीतिक वजन का हिसाब लेकर बातचीत की मेज पर बैठेंगे। 2024 में सवाल था कि भाजपा को रोकने के लिए विपक्ष एकजुट हो सकता है या नहीं; 2027 में सवाल यह होगा कि एकजुट विपक्ष में नेतृत्व, सीट और संगठन का संतुलन कौन कैसे तय करता है।

अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ा फैसला यही होगा कि कांग्रेस को कितनी जगह देकर भी सपा की केंद्रीय भूमिका बरकरार रखी जाए। राहुल गांधी और कांग्रेस के सामने सवाल होगा कि कितनी सीटों पर लड़कर संगठन को विस्तार दिया जा सकता है और साथ ही गठबंधन की संभावित चुनावी ताकत भी बनी रहे। इसीलिए आने वाले महीनों में नेताओं के बयान जितने महत्वपूर्ण होंगे, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण सीट-दर-सीट बातचीत होगी। क्योंकि यूपी की राजनीति में गठबंधन नारों से नहीं, उम्मीदवारों की सूची से अपनी असली तस्वीर दिखाता है।फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि 2027 से पहले सपा-कांग्रेस की दोस्ती की सबसे कठिन परीक्षा शुरू हो चुकी है। 2024 ने दोनों को साथ आने का फायदा दिखाया था, लेकिन 2027 उन्हें यह तय करने पर मजबूर करेगा कि उस फायदे की कीमत कौन कितनी सीटों के रूप में चुकाएगा और कौन कितनी सीटों के रूप में वसूलेगा। इमरान मसूद और इकरा हसन की बयानबाजी इसी बड़े सवाल की छोटी-सी झलक है। अभी गठबंधन की डोर टूटी नहीं है, लेकिन उस पर खिंचाव जरूर बढ़ गया है। अब असली नजर इस बात पर रहेगी कि जब अखिलेश और कांग्रेस नेतृत्व आमने-सामने बैठेंगे तो 403 सीटों की यह पूरी बाजी किस फॉर्मूले पर सुलझती है। वही फॉर्मूला तय करेगा कि 2027 में अखिलेश-राहुल की जोड़ी फिर एक मंच पर दिखाई देगी या 2024 की तस्वीर केवल एक बीती हुई चुनावी कहानी बनकर रह जाएगी।

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