यूपी की 10 राज्यसभा सीटों में छिपा 2027 का बड़ा सियासी गणित, किसका होगा फायदा?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल अभी आधिकारिक रूप से नहीं बजा है, लेकिन उससे पहले ही सत्ता और विपक्ष ने अपनी-अपनी बिसात पर मोहरे सजाने शुरू कर दिए हैं। राज्यसभा की 10 सीटों के लिए चुनाव कार्यक्रम सामने आते ही लखनऊ से दिल्ली तक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मतदान 16 अक्टूबर को होगा, 29 सितंबर को अधिसूचना जारी होगी, 6 अक्टूबर तक नामांकन दाखिल किए जा सकेंगे, 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 9 अक्टूबर नाम वापसी की अंतिम तारीख होगी। मतदान सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक चलेगा और उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना शुरू होगी। इन 10 सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है।पहली नजर में यह चुनाव राज्यसभा की 10 सीटों का सामान्य चुनाव दिखाई देता है, लेकिन उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीति में इसकी अहमियत इससे कहीं ज्यादा है। 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले होने वाला यह चुनाव दोनों प्रमुख खेमों के लिए केवल उच्च सदन में संख्या बढ़ाने का अवसर नहीं है, बल्कि अपने राजनीतिक संदेश, सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक ताकत को परखने का भी मौका है। यही वजह है कि राज्यसभा की इन 10 सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम पर होने वाला फैसला आने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीति की दिशा के बारे में भी संकेत दे सकता है। हालांकि इसे 2027 का निर्णायक ‘सेमीफाइनल’ कहना राजनीतिक विश्लेषण हो सकता है, चुनाव का नतीजा विधानसभा चुनाव की भविष्यवाणी नहीं करता। फिर भी यह जरूर है कि उम्मीदवारों का चयन दलों की प्राथमिकताओं को उजागर करेगा।
सबसे पहले राज्यसभा चुनाव का वह गणित समझना जरूरी है, जिस पर पूरा खेल टिका है। उत्तर प्रदेश विधानसभा की कुल क्षमता 403 सदस्यों की है, लेकिन इस समय छह सीटें रिक्त होने के कारण प्रभावी सदस्य संख्या 397 है। 10 राज्यसभा सीटों के चुनाव में एक उम्मीदवार को जीत के लिए लगभग 37 प्रथम वरीयता मतों की जरूरत होगी। इसलिए 40-41 वोट का आंकड़ा सही नहीं है। मौजूदा संख्या बल के आधार पर भाजपा नेतृत्व वाला एनडीए करीब 294 विधायकों के साथ सात सीटों पर मजबूत स्थिति में है, जबकि आठवीं सीट के लिए उसे अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी। दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस के कुल विधायक 103 बताए जा रहे हैं, जिससे सपा दो सीटों की स्थिति में है। सपा अगर तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसके सामने अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती होगी।यहीं से राज्यसभा चुनाव का असली रोमांच शुरू होता है। भाजपा के सामने चुनौती केवल सात सीटें जीतने की नहीं, बल्कि आठवीं सीट को भी सुरक्षित करने की है। संख्या बल उसके पक्ष में है, लेकिन आठवीं सीट के लिए अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के पास दो सीटें जीतने लायक संख्या है, मगर यदि पार्टी तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारती है तो मुकाबला सीधे संख्या बल से निकलकर दूसरी वरीयता के वोट, छोटे दलों के रुख और संभावित क्रॉस वोटिंग तक पहुंच सकता है। 2024 के राज्यसभा चुनाव में भी उत्तर प्रदेश में क्रॉस वोटिंग ने चुनावी गणित को बदल दिया था। भाजपा ने आठ सीटें जीती थीं, जबकि सपा के खाते में दो सीटें आई थीं। इसलिए इस बार भी केवल कागज पर मौजूद संख्या को अंतिम तस्वीर मानना जल्दबाजी होगी।
सपा के लिए यह चुनाव इसलिए खास है क्योंकि उसके पास अपनी मौजूदा एक सीट को बचाने के साथ बसपा की खाली हो रही सीट पर भी दावा मजबूत करने का अवसर है। बसपा की विधानसभा में इस समय कोई सदस्य नहीं है। उसके एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद पार्टी का विधानसभा में संख्याबल शून्य हो गया है। ऐसे में बसपा के पास अपने दम पर राज्यसभा सीट बचाने के लिए आवश्यक विधायक संख्या नहीं है। मौजूदा समीकरण में यही वह सीट है जिसे लेकर सपा की निगाहें सबसे ज्यादा टिकी हुई हैं। यदि सपा दो सीटें जीतती है तो राज्यसभा में उसका प्रतिनिधित्व एक से बढ़कर दो हो जाएगा और बसपा का उच्च सदन में प्रतिनिधित्व खत्म हो सकता है।लेकिन अखिलेश यादव की पार्टी केवल दो सीटों पर रुकने के बजाय तीसरे उम्मीदवार की संभावना पर भी विचार कर रही है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक सपा प्रो. रामगोपाल यादव को फिर से मैदान में उतारने और पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन को भी उम्मीदवार बनाने पर विचार कर रही है। तीसरे उम्मीदवार के जरिए पार्टी पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण का राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर सकती है। अगर तीसरा प्रत्याशी आता है तो मुकाबला सीधे भाजपा की आठवीं सीट से जुड़ जाएगा और तब एक-एक विधायक का रुख महत्वपूर्ण हो सकता है।
भाजपा की कहानी इससे भी ज्यादा दिलचस्प है, क्योंकि उसके सामने आठ मौजूदा चेहरों के कार्यकाल खत्म हो रहे हैं। इनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बीएल वर्मा, बृजलाल, नीरज शेखर, अरुण सिंह, सीमा द्विवेदी, गीता उर्फ चंद्रप्रभा और डॉ. दिनेश शर्मा की सीटें शामिल हैं। सपा से प्रो. रामगोपाल यादव और बसपा से रामजी गौतम का कार्यकाल खत्म हो रहा है। डॉ. दिनेश शर्मा अब अंडमान-निकोबार के उपराज्यपाल हैं, इसलिए उनकी खाली हुई सीट भी इसी चुनावी प्रक्रिया में शामिल है।यहीं भाजपा के लिए असली सवाल शुरू होता है क्या पुराने चेहरों को फिर मौका मिलेगा या 2027 को ध्यान में रखते हुए नए सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों वाले नेताओं को उच्च सदन भेजा जाएगा? हालिया रिपोर्टों में संकेत है कि भाजपा कुछ पुराने चेहरों को दोहरा सकती है, लेकिन अधिकतर सीटों पर नए चेहरों को मौका देने की चर्चा भी है। इस तरह उम्मीदवारों की सूची केवल नामों की सूची नहीं होगी, बल्कि यह बताएगी कि 2027 के लिए भाजपा किन सामाजिक वर्गों और किन क्षेत्रों को राजनीतिक प्राथमिकता दे रही है।
भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश से आठ नेताओं को जगह मिलना भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। पार्टी ने तीन महिला चेहरों, तीन ओबीसी नेताओं, एक ब्राह्मण और एक दलित चेहरे को राष्ट्रीय संगठन में स्थान दिया है, जबकि मुस्लिम समाज से जुड़े चेहरों को भी संगठन में जिम्मेदारी दी गई है। स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया है, जबकि रेखा वर्मा और तारिक मंसूर को फिर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। यह संगठनात्मक फेरबदल सीधे राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची तय नहीं करता, लेकिन इससे भाजपा की सामाजिक प्रतिनिधित्व की प्राथमिकताओं के संकेत जरूर मिलते हैं।इसीलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्यसभा के लिए भाजपा किन चेहरों को चुनती है। यदि पार्टी पुराने और अनुभवी नेताओं को दोहराती है तो इसका संदेश संगठनात्मक निरंतरता का हो सकता है। अगर बड़ी संख्या में नए चेहरे आते हैं तो इसे 2027 के लिए नई सामाजिक इंजीनियरिंग की कोशिश के रूप में पढ़ा जा सकता है। जाट, ब्राह्मण, महिला और ओबीसी प्रतिनिधित्व को लेकर भी भाजपा की रणनीति की चर्चा है। कुछ रिपोर्टों में स्मृति ईरानी जैसे नामों की चर्चा हुई है, हालांकि उम्मीदवारों की अंतिम सूची आने तक इन अटकलों को पक्की खबर मानना उचित नहीं होगा।
सपा के लिए भी उम्मीदवारों का चयन कम महत्वपूर्ण नहीं होगा। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव की राजनीति पीडीए के इर्द-गिर्द घूम रही है। ऐसे में राज्यसभा के तीसरे संभावित उम्मीदवार का सामाजिक और क्षेत्रीय परिचय पार्टी के चुनावी संदेश को प्रभावित कर सकता है। अगर सपा तीसरी सीट के लिए लड़ती है तो उसका लक्ष्य केवल एक अतिरिक्त राज्यसभा सदस्य भेजना नहीं होगा, बल्कि भाजपा के आठवें उम्मीदवार को रोकने और विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी खेमे में राजनीतिक उत्साह पैदा करने का भी होगा। हालांकि इसके लिए जरूरी अतिरिक्त विधायक जुटाना आसान नहीं होगा।यहां छोटे दलों की भूमिका भी अचानक बढ़ जाती है। एनडीए के पास 294 विधायकों का आंकड़ा बताया जा रहा है, लेकिन आठवीं सीट के लिए अतिरिक्त वोटों की जरूरत है। दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस के पास कुल 103 विधायक हैं। ऐसे में छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों का रुख महत्वपूर्ण हो सकता है। राजा भैया की पार्टी के दो विधायक और अन्य छोटे दलों के विधायक पहले से ही इस गणित का हिस्सा हैं। यही कारण है कि राज्यसभा चुनाव का अंतिम दौर नामांकन खत्म होने के बाद ज्यादा दिलचस्प हो सकता है।
और यहीं 2027 की राजनीति की असली झलक दिखाई देती है। राज्यसभा चुनाव में भाजपा यदि आठों सीटें बचा लेती है तो यह उसके संगठन और सहयोगी दलों के बीच समन्वय का संदेश होगा। सपा यदि अपनी दो सीटें सुरक्षित रखती है और तीसरी सीट के लिए भी मजबूत मुकाबला खड़ा करती है तो वह विपक्षी खेमे में अपनी सक्रियता दिखा सकेगी। लेकिन इनमें से किसी परिणाम को सीधे 2027 विधानसभा चुनाव का संकेतक मानना सही नहीं होगा। राज्यसभा चुनाव में विधायक वोट करते हैं, जबकि विधानसभा चुनाव में जनता सीधे अपने क्षेत्र के उम्मीदवार को चुनती है। दोनों चुनावों का मतदाता, मुद्दा और चुनावी वातावरण अलग होता है।फिर भी राजनीति में प्रतीक और संदेश का महत्व होता है। राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची से यह साफ हो सकता है कि भाजपा 2027 में किन सामाजिक समूहों को अपने साथ बनाए रखना चाहती है और सपा अपने पीडीए समीकरण को किस तरह विस्तार देना चाहती है। भाजपा के लिए यह चुनाव आठवीं सीट की संख्या का खेल है, जबकि सपा के लिए दो सीटों को सुरक्षित रखने के साथ तीसरी सीट के लिए राजनीतिक चुनौती खड़ी करने का अवसर। बसपा के लिए सबसे बड़ा सवाल अपने पुराने राज्यसभा प्रतिनिधित्व को बचाने का है, क्योंकि विधानसभा में शून्य संख्याबल के कारण उसके पास खुद के दम पर सीट जीतने का रास्ता नहीं है।
इस पूरे चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यही है कि नतीजे 16 अक्टूबर की शाम को सामने आ जाएंगे, लेकिन उनकी राजनीतिक गूंज 2027 के विधानसभा चुनाव तक सुनाई देती रह सकती है। 29 सितंबर से नामांकन शुरू होगा, 6 अक्टूबर को तस्वीर काफी हद तक साफ होने लगेगी और 9 अक्टूबर के बाद मुकाबले में उतरने वाले वास्तविक चेहरों का पता चल जाएगा। उसके बाद हर उम्मीदवार के सामाजिक आधार, क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक उपयोगिता पर चर्चा शुरू होगी।इसलिए उत्तर प्रदेश की इन 10 राज्यसभा सीटों को केवल दस सीटों का चुनाव समझना शायद पूरी कहानी नहीं होगी। यह चुनाव किसी पार्टी को 2027 की सत्ता नहीं दिलाएगा और न ही विधानसभा चुनाव का परिणाम पहले से तय करेगा। लेकिन यह जरूर बताएगा कि चुनाव से कुछ महीने पहले भाजपा और सपा अपने राजनीतिक मोहरों को किस तरह सजा रही हैं। भाजपा के सामने आठवीं सीट की चुनौती है, सपा के सामने तीसरी सीट के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती है और बसपा के सामने राज्यसभा में अपना प्रतिनिधित्व बचाने का कठिन सवाल है। अब निगाहें सिर्फ वोटिंग पर नहीं, उम्मीदवारों के नाम पर भी रहेंगी क्योंकि 2027 से पहले राज्यसभा की यह छोटी-सी सूची उत्तर प्रदेश की बड़ी सियासत में कई संकेत छोड़ सकती है।
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