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बुधवार, 23 सितंबर 2026

UP Doctor Service Bond: सरकारी पीजी पढ़ाई के बाद 2 साल की सेवा जरूरी, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

 


UP Doctor Service Bond: सरकारी पीजी पढ़ाई के बाद 2 साल की सेवा जरूरी, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में सरकारी संस्थानों से रियायती दर पर परास्नातक चिकित्सा शिक्षा हासिल करने वाले डॉक्टरों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। लखनऊ पीठ ने स्पष्ट किया है कि केवल सरकारी स्तर पर तैनाती में देरी होने से अनिवार्य सरकारी सेवा बांड अपने आप खत्म नहीं हो जाता। यानी जिस डॉक्टर ने सरकारी संस्थान से परास्नातक चिकित्सा शिक्षा के दौरान सेवा बांड की शर्त स्वीकार की है, उसे निर्धारित अवधि की सरकारी सेवा पूरी करनी होगी।न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की पीठ ने यह फैसला डॉक्टर अपरूपा सेन गुप्ता की याचिका पर सुनाया। डॉक्टर ने संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ से ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन में एमडी की पढ़ाई पूरी की थी। उनका कहना था कि पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद सरकार ने तीन महीने के भीतर उन्हें सेवा के लिए तैनाती नहीं दी, इसलिए दो वर्ष का अनिवार्य सेवा बांड समाप्त माना जाना चाहिए। अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

सरकारी पीजी शिक्षा के बाद सेवा बांड क्यों महत्वपूर्ण है

अदालत ने सेवा बांड को केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं माना। फैसले में कहा गया कि सरकारी संस्थानों में रियायती दर पर उपलब्ध कराई जाने वाली परास्नातक चिकित्सा शिक्षा के साथ जुड़ी अनिवार्य सरकारी सेवा का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना और मरीजों के जीवन के अधिकार की रक्षा करना है। इस वजह से केवल नियुक्ति या तैनाती में प्रशासनिक देरी को आधार बनाकर सेवा बांड से स्वत: मुक्ति नहीं मिल सकती।उत्तर प्रदेश में डॉक्टरों के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी संस्थानों में परास्नातक चिकित्सा शिक्षा हासिल करने के बाद सेवा की शर्तें पहले से निर्धारित रहती हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रदेश में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत तीन महीने के भीतर पोस्टिंग नहीं मिलने पर डॉक्टर स्वत: सेवा बांड की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए।

पीडीसीसी करने के लिए लिया था अनापत्ति प्रमाणपत्र

मामले में डॉक्टर सेन गुप्ता ने आगे की पढ़ाई के लिए पोस्ट-डॉक्टोरल सर्टिफिकेट कोर्स यानी पीडीसीसी करने की अनुमति ली थी। इसके लिए उन्हें सरकार की ओर से अनापत्ति प्रमाणपत्र भी मिला था। अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद इस प्रमाणपत्र को महत्वपूर्ण माना।प्रमाणपत्र में स्पष्ट शर्त थी कि पीडीसीसी में बिताया गया समय अनिवार्य सरकारी सेवा बांड की अवधि में शामिल नहीं किया जाएगा। इसलिए डॉक्टर द्वारा पीडीसीसी के दौरान बिताए गए समय को दो वर्ष की सरकारी सेवा में जोड़ने का दावा स्वीकार नहीं किया गया।हालांकि अदालत ने यह भी माना कि बाद की प्रक्रिया में डॉक्टर को काउंसलिंग का अवसर नहीं मिलना एक अलग प्रशासनिक समस्या थी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सरकार को उनके लिए नई काउंसलिंग कराने का निर्देश दिया।

2021 बैच की डॉक्टर को नहीं मिला काउंसलिंग का मौका

अदालत के सामने यह तथ्य आया कि 1 जून 2026 को जारी काउंसलिंग संबंधी सूचना 2022 बैच के एमडी और एमएस अभ्यर्थियों तथा 2023 बैच के डिप्लोमा अभ्यर्थियों के लिए थी। डॉक्टर सेन गुप्ता 2021 बैच से संबंधित थीं। इस कारण वह उस काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सकीं।हाईकोर्ट ने इस पहलू को ध्यान में रखते हुए चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशक को डॉक्टर के लिए नई काउंसलिंग कराने का निर्देश दिया है। उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेजों और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में उपलब्ध रिक्त पदों में से विकल्प चुनने का अवसर दिया जाएगा।

27 सितंबर से चार सप्ताह में पूरी करनी होगी प्रक्रिया

अदालत ने राज्य सरकार को नई काउंसलिंग और उससे जुड़ी पूरी प्रक्रिया 27 सितंबर 2026 से चार सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है। इसका अर्थ है कि संबंधित विभाग को निर्धारित समयसीमा में रिक्त पदों की जानकारी, काउंसलिंग और तैनाती से जुड़ी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।यह निर्देश डॉक्टर के मामले तक सीमित प्रशासनिक समाधान के रूप में सामने आया है। अदालत ने उन्हें उपलब्ध सरकारी संस्थानों में रिक्त पदों के आधार पर अपनी पसंद चुनने का अवसर देने को कहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अदालत ने सेवा बांड को खत्म करने के बजाय उसकी शर्तों के तहत उचित तैनाती का रास्ता अपनाया है।

89 दिन की वरिष्ठ रेजीडेंसी सेवा भी बांड में जुड़ेगी

फैसले का एक अहम हिस्सा डॉक्टर द्वारा एसजीपीजीआई में की गई 89 दिन की वरिष्ठ रेजीडेंसी सेवा से जुड़ा है। अदालत ने निर्देश दिया कि पीडीसीसी पूरा करने के बाद एसजीपीजीआई में वरिष्ठ रेजीडेंट के रूप में डॉक्टर ने 89 दिन जो सेवा दी, उसे दो वर्ष की अनिवार्य सरकारी सेवा बांड अवधि में समायोजित किया जाए।रिकॉर्ड के अनुसार यह सेवा 2 मई से 29 जुलाई 2026 के बीच की गई थी। अदालत ने माना कि इस अवधि में डॉक्टर ने वास्तव में सरकारी अस्पताल में सेवाएं दी थीं। इसलिए उस सेवा अवधि को पूरी तरह नजरअंदाज करने के बजाय अनिवार्य सरकारी सेवा बांड में समायोजित करने का निर्देश दिया गया।दो वर्ष में 730 दिन होते हैं, यदि सामान्य 365 दिन वाले दो वर्षों की गणना की जाए। ऐसे में 89 दिन की सेवा को समायोजित करने का अर्थ है कि बांड की निर्धारित अवधि में डॉक्टर की पहले से की गई सरकारी सेवा का भी हिसाब रखा जाएगा। हालांकि वास्तविक शेष अवधि की गणना संबंधित विभाग द्वारा सेवा रिकॉर्ड और लागू नियमों के आधार पर की जाएगी।

नई काउंसलिंग तक एसजीपीजीआई में जारी रहेगी सेवा

हाईकोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर यह भी निर्देश दिया कि जब तक नई काउंसलिंग पूरी नहीं हो जाती, डॉक्टर एसजीपीजीआई में वरिष्ठ रेजीडेंट के रूप में काम जारी रखेंगी। इससे काउंसलिंग पूरी होने तक उनकी सेवा में अचानक व्यवधान नहीं आएगा।अदालत का फैसला एक तरफ सरकारी चिकित्सा शिक्षा के बाद सेवा बांड की अनिवार्यता को स्पष्ट करता है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक प्रक्रिया में हुई गलती को सुधारने का रास्ता भी देता है। डॉक्टर को नई काउंसलिंग में भाग लेने का अवसर दिया गया है और पहले की 89 दिन की वरिष्ठ रेजीडेंसी को भी सेवा अवधि में शामिल करने का निर्देश दिया गया है।

डॉक्टरों के लिए क्या है इस फैसले का मतलब

इस फैसले से सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आती है कि सरकारी संस्थान से रियायती दर पर परास्नातक चिकित्सा शिक्षा लेने वाले डॉक्टरों को सेवा बांड की शर्तों को गंभीरता से पूरा करना होगा। केवल तैनाती में देरी होने के आधार पर बांड खत्म नहीं माना जाएगा।साथ ही, यदि प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण किसी पात्र डॉक्टर को काउंसलिंग में शामिल होने का अवसर नहीं मिलता है, तो संबंधित विभाग को उचित प्रक्रिया अपनानी होगी। इस मामले में अदालत ने नई काउंसलिंग कराने, उपलब्ध सरकारी संस्थानों में विकल्प देने और पहले की 89 दिन की सेवा को बांड में समायोजित करने के निर्देश दिए हैं।इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश में सरकारी चिकित्सा शिक्षा, सेवा बांड और डॉक्टरों की अनिवार्य सरकारी तैनाती से जुड़े मामलों में यह आदेश महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है। खास तौर पर उन डॉक्टरों के लिए जो सरकारी संस्थानों से परास्नातक या उससे आगे की चिकित्सा शिक्षा लेकर सेवा बांड के दायरे में आते हैं।

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