एनटीए की नई परीक्षा व्यवस्था क्या छात्रों का भरोसा फिर लौटा पाएगी
NTA Latest Update: राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की परीक्षाओं में सवाल सिर्फ एक गलत शब्द का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है, जिसके आधार पर लाखों युवा महीनों तक पढ़ाई करते हैं और कुछ घंटों की परीक्षा में अपने भविष्य का फैसला होने देते हैं। ऐसे में प्रश्नपत्र में तथ्यात्मक गलती, गलत अनुवाद या पुराने सवालों की बड़ी संख्या केवल संपादकीय चूक नहीं रह जाती। यह सीधे परीक्षा की निष्पक्षता पर असर डालती है। जून 2026 की यूजीसी नेट परीक्षा ने इसी चिंता को फिर सामने ला दिया।30 जून को समाजशास्त्र की परीक्षा के बाद अभ्यर्थियों ने प्रश्नपत्र में कई गंभीर भाषाई और तथ्यात्मक गलतियों की शिकायत की। प्रमुख समाजशास्त्रियों के नाम तक बिगड़े हुए थे। जॉर्ज रिट्जर को पुट्जर, टैल्कॉट पार्सन्स को पार्सो और जी एस घुर्ये को घुन्ये लिखा गया। ए आर देसाई का नाम भी गलत छपा। हिंदी अनुवाद की गुणवत्ता पर भी सवाल उठे। इन गलतियों का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि समाजशास्त्र में किसी विचारक का नाम या अवधारणा ही प्रश्न का अर्थ बदल सकती है। अभ्यर्थियों ने यह भी कहा कि कुछ प्रश्न पाठ्यक्रम से बाहर जैसे लग रहे थे।
अंग्रेजी और वाणिज्य के प्रश्नपत्रों में पुराने प्रश्नों के दोहराव को लेकर भी गंभीर आपत्तियां सामने आईं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक अंग्रेजी में 150 में से 67 प्रश्नों के हूबहू या बेहद करीब दोहराए जाने की शिकायत हुई। वाणिज्य में भी बड़ी संख्या में सवाल पहले के प्रश्नपत्र से मिलते होने की बात सामने आई। यही वह बिंदु था जहां सामान्य गलती और परीक्षा की विश्वसनीयता के बीच का अंतर खत्म होने लगा। अगर किसी उम्मीदवार को पुराने प्रश्न पहले से उपलब्ध हैं और दूसरे उम्मीदवार को नहीं, तो समान परीक्षा का सिद्धांत ही कमजोर पड़ जाता है।एनटीए की आंतरिक जांच में तीनों विषयों के प्रश्नपत्रों में गंभीर कमियां सामने आने के बाद इन्हें रद्द कर पुनर्परीक्षा का निर्णय लिया गया। 9 और 10 सितंबर को होने वाली पुनर्परीक्षा में करीब डेढ़ लाख अभ्यर्थियों के शामिल होने की बात सामने आई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रभावित उम्मीदवारों से दोबारा परीक्षा शुल्क नहीं लिया जाएगा और यूजीसी नेट के बाकी 84 विषयों की परीक्षा इस फैसले से प्रभावित नहीं होगी। यह राहत है, लेकिन असली सवाल यही है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई।
यहीं से एनटीए के ताजा बदलाव का महत्व समझ में आता है। एजेंसी ने करीब 600 विषय विशेषज्ञों वाले पुराने प्रश्नपत्र निर्माण पैनल को बदलने और नई विशेषज्ञ टीम जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की है। इसके साथ प्रश्नपत्र को परीक्षा में भेजने से पहले चार स्तरों पर जांच की व्यवस्था लागू की जा रही है। प्रश्न की भाषा, तथ्य, पाठ्यक्रम से उसका संबंध, उत्तर विकल्पों की शुद्धता और अनुवाद जैसे अलग-अलग पहलुओं को अधिक व्यवस्थित ढंग से जांचना होगा। इसीलिए व्यवस्था में केवल विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। विषय विशेषज्ञता, भाषा संपादन, तथ्य सत्यापन और अनुवाद के बीच जिम्मेदारियां तय करनी होंगी, ताकि गलती स्तर तक पहुंचने से पहले पकड़ी जा सके।यह बदलाव अचानक पैदा नहीं हुआ। 2024 में नीट-यूजी और यूजीसी नेट विवाद के बाद शिक्षा मंत्रालय ने पूर्व इसरो अध्यक्ष के राधाकृष्णन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति बनाई थी। समिति ने परीक्षा प्रक्रिया, डेटा सुरक्षा, प्रश्नपत्र निर्माण और एनटीए की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए 101 सिफारिशें दी थीं। सरकार ने बाद में संसद में बताया कि प्रश्नपत्र तैयार करने और उसकी जांच के लिए निर्धारित प्रोटोकॉल बनाने की सिफारिश भी रिपोर्ट में शामिल थी। यानी समस्या केवल किसी एक परीक्षा या टीम की नहीं, पूरी प्रक्रिया को संस्थागत बनाने की थी।
राधाकृष्णन समिति ने एनटीए में विषय-विशेषज्ञ स्थायी क्षमता बढ़ाने, ठेकेदारों पर निर्भरता घटाने, प्रश्नपत्र तैयार करने और परीक्षा संचालन के लिए अलग विशेषज्ञ ढांचा विकसित करने तथा सुरक्षा प्रक्रिया को मजबूत करने पर जोर दिया था। एनटीए ने भी इस साल संस्थागत सुधार कार्यक्रम में प्रश्नपत्र तैयारी, अनुवाद, छपाई और लॉजिस्टिक्स में तकनीकी सुरक्षा उपाय बढ़ाने की बात कही है।इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प विरोधाभास भी है। एनटीए की अपनी पुरानी परीक्षा विकास व्यवस्था में प्रश्न बैंक, विषय विशेषज्ञों की समितियां, मनोमितीय विशेषज्ञ और कई दौर की समीक्षा की परिकल्पना पहले से मौजूद रही है। यानी कागज पर जांच की अवधारणा नई नहीं है। नई बात यह होनी चाहिए कि अब वही प्रक्रिया वास्तव में स्वतंत्र, दस्तावेजीकृत और जवाबदेह बने। चार स्तर की जांच तभी प्रभावी होगी जब हर स्तर पर जिम्मेदारी तय हो, जांच का रिकॉर्ड सुरक्षित रहे और गलती सामने आने पर यह पता लगाया जा सके कि चूक किस चरण में हुई।
छात्रों के लिए सबसे बड़ा सवाल अब भरोसे का है। उम्मीदवार दोबारा तैयारी करता है, दूसरी तारीख के लिए मानसिक दबाव झेलता है और परिणाम की अनिश्चितता में आगे की पढ़ाई या नौकरी की योजना रोक देता है। इसलिए सुधार का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि इस बार प्रश्नपत्र में गलती नहीं हुई। असली कसौटी यह होगी कि उम्मीदवार को लगे कि परीक्षा बनाने वाली पूरी व्यवस्था उसके खिलाफ नहीं, उसके अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ी है।एनटीए के सामने अब अवसर भी है और चुनौती भी। 600 विशेषज्ञों का बदलाव और चार-स्तरीय समीक्षा बड़ा प्रशासनिक कदम जरूर है, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए पारदर्शिता उतनी ही जरूरी है। उम्मीदवारों को यह जानने का अधिकार है कि प्रश्नपत्र कितने चरणों से गुजरा, विषय विशेषज्ञता कैसे तय हुई, अनुवाद किस स्तर पर जांचा गया और आपत्ति आने पर निर्णय किस आधार पर लिया गया। परीक्षा की गोपनीयता जरूरी है, लेकिन प्रक्रिया की जवाबदेही उससे अलग चीज है।देश में राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है। यूजीसी नेट से सहायक प्रोफेसर बनने की पात्रता, जूनियर रिसर्च फेलोशिप और पीएचडी प्रवेश जैसे रास्ते जुड़े हैं। इसलिए यहां एक छोटी तकनीकी गलती भी हजारों करियर पर असर डाल सकती है। एनटीए का नया प्रयोग तभी सफल माना जाएगा जब सितंबर की पुनर्परीक्षा केवल विवाद खत्म करने का माध्यम न बने, बल्कि ऐसी व्यवस्था की शुरुआत साबित हो जिसमें प्रश्नपत्र परीक्षा कक्ष तक पहुंचने से पहले ही कई स्वतंत्र नजरों से गुजर चुका हो। छात्रों को अब आश्वासन नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसकी शुद्धता पर उन्हें सवाल पूछने की जरूरत ही न पड़े।
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