Old Pension Scheme: OPS वापसी पर केंद्र का बड़ा संकेत, UPS में कितनी पेंशन मिलेगी
पुरानी पेंशन योजना यानी OPS को लेकर सरकारी कर्मचारियों की उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है, लेकिन केंद्र सरकार का रुख जरूर साफ दिखाई देने लगा है। फरवरी 2026 में लोकसभा में दिए गए जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश ने NPS से OPS की तरफ वापसी की है, लेकिन केंद्र सरकार ने इन राज्यों को इसके लंबे समय के वित्तीय असर को लेकर आगाह किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र ने राज्यों के OPS पर लौटने को उनका नीतिगत फैसला माना है, जबकि केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए OPS बहाली की कोई योजना सामने नहीं रखी गई है।यही वह बिंदु है जहां OPS की मांग और केंद्र की नई पेंशन नीति आमने-सामने खड़ी दिखाई देती है। सरकार का तर्क है कि OPS में कर्मचारी को निश्चित पेंशन मिलती है, लेकिन इस पेंशन की भविष्य की पूरी जिम्मेदारी सरकार के बजट पर आती है। इसके विपरीत NPS में कर्मचारी और सरकार दोनों योगदान करते हैं और रिटायरमेंट के लिए एक कोष तैयार होता है। UPS ने इन दोनों के बीच एक अलग रास्ता बनाया है। इसमें NPS की अंशदायी व्यवस्था बरकरार रहती है, लेकिन कर्मचारी को रिटायरमेंट के बाद एक तय न्यूनतम भुगतान का भरोसा मिलता है।
यूपीएस को समझने के लिए सबसे पहले OPS और NPS का अंतर समझना जरूरी है। पुरानी व्यवस्था में पेंशन का भुगतान मुख्य रूप से सरकार की जिम्मेदारी थी। कर्मचारी के रिटायर होने के बाद उसकी पेंशन तय नियमों के मुताबिक मिलती थी और महंगाई बढ़ने पर महंगाई राहत भी बढ़ती थी। NPS में तस्वीर बदल गई। यहां कर्मचारी के वेतन से योगदान और सरकार के योगदान से पेंशन कोष बनाया जाता है। इस रकम का निवेश किया जाता है और रिटायरमेंट के समय मिलने वाला लाभ जमा कोष तथा उससे जुड़ी शर्तों पर निर्भर करता है। यही बाजार आधारित अनिश्चितता कर्मचारियों की सबसे बड़ी चिंता बनी।केंद्र ने इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए 24 अगस्त 2024 को UPS को मंजूरी दी और इसे 1 अप्रैल 2025 से लागू किया गया। अब यह केवल घोषणा नहीं है, बल्कि इसके लिए नियम और नियामकीय ढांचा भी तैयार हो चुका है। मौजूदा व्यवस्था के तहत UPS केंद्रीय कर्मचारियों के लिए NPS के भीतर एक विकल्प के रूप में काम करता है। यानी इसे OPS की सीधी वापसी कहना सही नहीं होगा। सरकार ने निश्चित पेंशन का तत्व जोड़ा है, लेकिन अंशदान आधारित ढांचा भी बनाए रखा है।
अब सवाल आता है कि UPS में आखिर कितनी पेंशन मिलेगी। नियम के मुताबिक अगर कर्मचारी ने कम से कम 25 साल की अर्हक सेवा पूरी की है तो रिटायरमेंट से ठीक पहले के 12 महीनों के औसत मूल वेतन का 50 प्रतिशत सुनिश्चित भुगतान मिलेगा। मसलन किसी कर्मचारी का आखिरी 12 महीने का औसत मूल वेतन 80,000 रुपये है तो सामान्य स्थिति में उसका सुनिश्चित भुगतान 40,000 रुपये मासिक होगा। 25 साल से कम सेवा होने पर राशि आनुपातिक तरीके से तय होगी। 10 साल की अर्हक सेवा पूरी करने वाले कर्मचारी के लिए न्यूनतम सुनिश्चित भुगतान 10,000 रुपये प्रति माह रखा गया है।इसका मतलब यह भी है कि हर कर्मचारी को सीधे आखिरी वेतन का आधा हिस्सा नहीं मिलेगा। 50 प्रतिशत का पूरा लाभ 25 साल की अर्हक सेवा पूरी होने पर मिलता है। आधिकारिक गणना के अनुसार सुनिश्चित भुगतान का सूत्र औसत मूल वेतन के आधे हिस्से को अर्हक सेवा के महीनों के अनुपात से जोड़ता है और अधिकतम 300 महीने यानी 25 साल की सेवा को माना जाता है। इसलिए सेवा अवधि जितनी कम होगी, सुनिश्चित भुगतान भी उसी अनुपात में घटेगा।
UPS में महंगाई से सुरक्षा का भी प्रावधान है। सुनिश्चित पेंशन, न्यूनतम पेंशन और पारिवारिक पेंशन पर महंगाई राहत यानी DR का प्रावधान किया गया है। यह राहत औद्योगिक श्रमिकों के अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी AICPI-IW के आधार पर जुड़ती है। इसका सीधा मतलब है कि पेंशन की रकम महंगाई के बढ़ते दबाव से पूरी तरह अलग नहीं रहेगी।कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार के लिए भी प्रावधान रखा गया है। जीवित पति या पत्नी को कर्मचारी की मृत्यु से ठीक पहले मिलने वाले सुनिश्चित भुगतान का 60 प्रतिशत पारिवारिक पेंशन के तौर पर मिलता है। इस पर भी महंगाई राहत का प्रावधान है। उदाहरण के लिए अगर किसी कर्मचारी का सुनिश्चित भुगतान 40,000 रुपये था तो पात्र जीवनसाथी के लिए पारिवारिक पेंशन 24,000 रुपये होगी, जिस पर नियमानुसार महंगाई राहत भी लागू होगी।रिटायरमेंट के समय UPS में एकमुश्त भुगतान का प्रावधान भी है। यह ग्रेच्युटी से अलग है। प्रत्येक पूरी छह महीने की सेवा के लिए रिटायरमेंट के समय मिलने वाले मासिक परिलब्धियों यानी मूल वेतन और महंगाई भत्ते के योग के दसवें हिस्से के बराबर रकम की गणना की जाती है। सरकार के मुताबिक इस भुगतान से सुनिश्चित पेंशन की मूल मात्रा अपने आप कम नहीं होती। हालांकि मौजूदा नियमों में अंतिम निकासी के विकल्प और उसके असर को लेकर अलग प्रावधान हैं, इसलिए इसे हर स्थिति में बिना किसी प्रभाव वाली अतिरिक्त निकासी मानना ठीक नहीं होगा।
अब OPS पर लौटने वाले राज्यों की तस्वीर देखिए। फरवरी 2026 के लोकसभा जवाब के अनुसार पांच राज्यों ने NPS से OPS में वापसी की है। 31 दिसंबर 2025 तक इन राज्यों के NPS से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान के 5,19,800 खातों में कुल योगदान 28,364.67 करोड़ रुपये और कुल परिसंपत्ति 51,434.26 करोड़ रुपये थी। पंजाब में 2,09,514 खातों के लिए कुल योगदान 23,828.31 करोड़ रुपये और परिसंपत्तियां 33,905.12 करोड़ रुपये थीं। छत्तीसगढ़ में 2,87,859 खातों का योगदान 12,359.95 करोड़ और परिसंपत्तियां 22,762.93 करोड़ रुपये थीं। झारखंड में 1,17,352 खातों का योगदान 8,142.32 करोड़ और परिसंपत्तियां 14,428.28 करोड़ रुपये थीं। हिमाचल प्रदेश में 1,10,425 खातों का योगदान 8,104.96 करोड़ और परिसंपत्तियां 11,128.10 करोड़ रुपये थीं।यहीं से OPS की असली आर्थिक बहस शुरू होती है। सीएजी की राज्य वित्त रिपोर्टों में बार-बार यह चिंता सामने आई है कि OPS एक अनफंडेड डिफाइंड-बेनिफिट व्यवस्था है। इसका मतलब यह है कि भविष्य की पेंशन के लिए NPS की तरह उसी अनुपात में अलग कोष तैयार नहीं होता। जैसे-जैसे कर्मचारियों की संख्या और जीवन प्रत्याशा बढ़ती है, सरकार पर भविष्य में पेंशन भुगतान का दबाव भी बढ़ सकता है। सीएजी ने कई मामलों में इसे राज्य की प्रतिबद्ध देनदारियों और राजकोषीय अनुशासन से जोड़कर देखा है।
हिमाचल प्रदेश इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। वहां OPS लागू होने के बाद करीब 1.10 लाख कर्मचारियों से जुड़ी 8,104.96 करोड़ रुपये की NPS योगदान राशि और 11,128.10 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां 31 दिसंबर 2025 तक दर्ज थीं। इसी तरह राजस्थान के मामले में OPS लागू होने के बावजूद NPS का पुराना कोष राज्य को वापस करने का रास्ता मौजूद नहीं है। इससे साफ होता है कि OPS में वापसी केवल पेंशन भुगतान की नीति बदलना नहीं है, बल्कि पुराने अंशदान, भविष्य की देनदारी और बजट प्रबंधन का भी बड़ा सवाल है।इसलिए केंद्र की नीति को केवल OPS बनाम NPS की लड़ाई के रूप में देखना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि कर्मचारी को रिटायरमेंट के बाद कितनी निश्चितता मिले और सरकार उस निश्चितता की कीमत कितनी पीढ़ियों तक उठाए। OPS कर्मचारी को मजबूत निश्चितता देता है, लेकिन भविष्य का वित्तीय जोखिम सरकार के ऊपर डालता है। NPS सरकार का तत्काल जोखिम घटाता है, लेकिन कर्मचारी को बाजार से जुड़ी अनिश्चितता के सामने छोड़ता है। UPS इसी बीच का रास्ता है, जहां कर्मचारी को 25 साल की सेवा पर औसत अंतिम 12 महीने के मूल वेतन का 50 प्रतिशत सुनिश्चित भुगतान, न्यूनतम 10,000 रुपये की गारंटी, 60 प्रतिशत पारिवारिक पेंशन और महंगाई राहत मिलती है, जबकि पूरी व्यवस्था NPS के अंशदायी ढांचे के भीतर चलती है।फिलहाल सबसे साफ संदेश यही है कि केंद्र सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के लिए OPS की वापसी का दरवाजा नहीं खोला है। राज्यों को अपने स्तर पर फैसला करने की स्वतंत्रता है, लेकिन केंद्र और सीएजी दोनों की चेतावनी भी सामने है कि आज की राहत कहीं कल की भारी देनदारी न बन जाए। कर्मचारियों के लिए UPS इसलिए महज नई पेंशन योजना नहीं, बल्कि OPS जैसी निश्चितता और NPS जैसी अंशदायी व्यवस्था के बीच बनाया गया समझौता है। आने वाले वर्षों में इसकी असली परीक्षा इस बात से होगी कि यह कर्मचारी की पेंशन को कितना भरोसा देता है और सरकारी खजाने पर कितना नियंत्रित बोझ डालता है।
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