8th Pay Commission: 9 महीने पूरे निर्णायक दौर में पहुंचा आयोग कर्मचारियों-पेंशनर्स के लिए बड़े अपडेट
केंद्र सरकार के करीब 48 लाख कर्मचारियों और 67 लाख से अधिक पेंशनभोगियों की निगाहें इस समय 8वें केंद्रीय वेतन आयोग पर टिकी हैं। इसकी वजह सिर्फ वेतन बढ़ोतरी नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की पूरी वेतन और पेंशन व्यवस्था है। 3 नवंबर 2025 को जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित आयोग 3 अगस्त 2026 को अपने कामकाज के नौ महीने पूरे कर लेगा। यानी आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए मिले 18 महीने के समय का आधा हिस्सा पूरा हो जाएगा। यही कारण है कि अब आयोग की गतिविधियां पहले से ज्यादा तेज दिखाई दे रही हैं। लगातार राज्यों का दौरा, कर्मचारी संगठनों से बैठकें और हजारों सुझावों का अध्ययन इस बात का संकेत है कि आयोग अब अपनी अंतिम सिफारिशों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।8वें वेतन आयोग की कहानी जनवरी 2025 से शुरू होती है। 16 जनवरी 2025 को केंद्र सरकार ने नए वेतन आयोग के गठन का फैसला किया था। इसके बाद 28 अक्टूबर 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस को मंजूरी दी और 3 नवंबर 2025 को आयोग का औपचारिक गठन कर दिया गया। सरकार ने आयोग को वेतन, पेंशन, भत्तों, सेवा शर्तों और कर्मचारियों से जुड़े सभी वित्तीय मामलों की समीक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपी। साथ ही यह भी कहा गया कि आयोग अपनी सिफारिशें तैयार करते समय देश की आर्थिक स्थिति, महंगाई, राजकोषीय अनुशासन और सरकारी वित्तीय क्षमता का भी ध्यान रखेगा।
आयोग ने शुरुआती तीन महीनों में अपना पूरा ढांचा तैयार किया। 7 फरवरी 2026 को आधिकारिक वेबसाइट, ऑनलाइन डेटा पोर्टल और हितधारक परामर्श मंच शुरू किया गया। इसके जरिए कर्मचारी संगठनों, मंत्रालयों, विभागों और पेंशनर्स से सुझाव मांगे गए। आयोग ने पहली बार पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाने पर जोर दिया ताकि देशभर से एक समान प्रारूप में आंकड़े और सुझाव मिल सकें। बाद में बड़ी संख्या में आवेदन आने के कारण ज्ञापन जमा करने की अंतिम तिथि भी बढ़ाकर 15 जून 2026 कर दी गई। इससे हजारों कर्मचारी संगठनों और पेंशनर्स एसोसिएशनों को अपनी मांगें दर्ज कराने का अतिरिक्त अवसर मिला।इसके बाद आयोग ने देशभर में क्षेत्रीय परामर्श का सिलसिला शुरू किया। अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच कोलकाता, भुवनेश्वर, हैदराबाद, श्रीनगर, लद्दाख, पुणे, लखनऊ समेत कई शहरों में कर्मचारी संगठनों के साथ बैठकें हुईं। इन बैठकों में केंद्रीय कर्मचारियों, रक्षा कर्मचारियों, रेलवे, डाक विभाग, आयकर, लेखा एवं ऑडिट सेवाओं, वैज्ञानिक संस्थानों और विभिन्न मंत्रालयों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। आयोग का उद्देश्य केवल ज्ञापन लेना नहीं था, बल्कि यह समझना था कि अलग-अलग विभागों की वास्तविक समस्याएं क्या हैं और वेतन संरचना में किन सुधारों की सबसे ज्यादा जरूरत है।
अब आयोग की गतिविधियां और तेज हो गई हैं। 23 जुलाई 2026 को आयोग ने दिल्ली में 7 और 10 अगस्त को होने वाली बैठकों का कार्यक्रम जारी किया। इन बैठकों में उन कर्मचारी संगठनों और विभागों को बुलाया गया है जिन्होंने पहले आयोग को अपना ज्ञापन सौंपा है। इसके तुरंत बाद 24 जुलाई को चेन्नई और पुडुचेरी के लिए भी क्षेत्रीय दौरे की घोषणा कर दी गई। चेन्नई में 7 और 8 सितंबर तथा पुडुचेरी में 9 सितंबर को संबंधित पक्षों के साथ बैठकें होंगी। इन बैठकों के लिए 18 अगस्त तक आवेदन मांगे गए हैं। लगातार नए कार्यक्रम जारी होने से साफ है कि आयोग अब अंतिम दौर के परामर्श में प्रवेश कर चुका है।कर्मचारी संगठनों की सबसे बड़ी मांग न्यूनतम वेतन और फिटमेंट फैक्टर को लेकर है। सातवें वेतन आयोग में न्यूनतम वेतन 18 हजार रुपये तय किया गया था, जबकि अब कई संगठन इसे 51 हजार से 60 हजार रुपये तक करने की मांग उठा रहे हैं। फिटमेंट फैक्टर को भी 2.57 से बढ़ाकर 2.86, 3.00 या उससे अधिक करने की मांग अलग-अलग संगठनों की ओर से रखी गई है। हालांकि आयोग ने अभी तक इन मांगों पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है। आयोग का कहना है कि सभी सुझावों का अध्ययन करने के बाद ही अंतिम सिफारिशें तैयार की जाएंगी।
सिर्फ वेतन ही नहीं, बल्कि महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता, परिवहन भत्ता, बच्चों की शिक्षा भत्ता, ग्रेच्युटी, पेंशन और पारिवारिक पेंशन जैसे विषय भी आयोग के एजेंडे में शामिल हैं। कर्मचारी संगठन पुरानी विसंगतियों को दूर करने, पदोन्नति प्रणाली में सुधार और पेंशन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की भी मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कर्मचारियों के हितों और राजकोषीय अनुशासन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि 7वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद केंद्र सरकार के वेतन और पेंशन पर होने वाला वार्षिक खर्च काफी बढ़ा था। ऐसे में 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों का असर भी सरकारी वित्त पर बड़ा पड़ेगा।यही वजह है कि आयोग केवल मांगों के आधार पर फैसला नहीं करेगा, बल्कि आर्थिक वृद्धि, महंगाई दर, सरकारी आय, कर संग्रह, वित्तीय घाटा और भविष्य की जरूरतों का भी विस्तृत अध्ययन कर रहा है। मंत्रालयों से कर्मचारियों का सेवा डेटा और वित्तीय विवरण भी लगातार मांगे जा रहे हैं। आयोग ने ऑनलाइन डेटा पोर्टल के जरिए विभागवार सूचनाएं जुटाने की प्रक्रिया को भी अंतिम चरण में पहुंचा दिया है।
अब जबकि आयोग अपनी तय अवधि के आधे सफर पर पहुंच चुका है, आने वाले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। दिल्ली, चेन्नई और पुडुचेरी में होने वाली बैठकों के बाद आयोग के पास देशभर के कर्मचारी संगठनों, पेंशनर्स और विभिन्न विभागों की लगभग पूरी तस्वीर होगी। इसके आधार पर मसौदा सिफारिशों पर काम तेज होगा और यदि सब कुछ तय समय के अनुसार चला तो 2027 के मध्य तक आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप सकता है। इसके बाद फैसला सरकार के हाथ में होगा कि किन सिफारिशों को मंजूरी दी जाए और उन्हें कब से लागू किया जाए। फिलहाल इतना तय है कि 8वां वेतन आयोग अब औपचारिक बैठकों के दौर से निकलकर उस निर्णायक चरण में पहुंच गया है, जहां लिए गए फैसले आने वाले वर्षों में लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की आर्थिक स्थिति तय करेंगे।
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