69,000 शिक्षक भर्ती: योगी सरकार का सुप्रीम कोर्ट में बड़ा हलफनामा किसी की नौकरी नहीं जाएगी?
साल 2018 में जब उत्तर प्रदेश सरकार ने 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती का विज्ञापन जारी किया था, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह भर्ती प्रदेश के इतिहास की सबसे लंबी कानूनी लड़ाइयों में बदल जाएगी। लाखों युवाओं ने इसे सरकारी नौकरी पाने का अवसर माना था, लेकिन अगले सात वर्षों में यह भर्ती सिर्फ परीक्षा और नियुक्ति तक सीमित नहीं रही। यह मेरिट, आरक्षण, कटऑफ, संवैधानिक अधिकार और न्यायिक व्याख्या का ऐसा मामला बन गई, जिसने हजारों अभ्यर्थियों की जिंदगी को प्रभावित किया। कई युवाओं की उम्र प्रतियोगी परीक्षाओं की सीमा पार कर गई, हजारों परिवार अदालत के फैसलों पर नजर टिकाए बैठे रहे और वर्ष 2020 में नियुक्त हुए 67,867 शिक्षक हर सुनवाई के साथ इस डर में जीते रहे कि कहीं अगला आदेश उनकी नौकरी पर भारी न पड़ जाए। अब सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे ने पहली बार ऐसा रास्ता सामने रखा है, जिससे वर्षों से चले आ रहे इस विवाद के शांत होने की उम्मीद जगी है।राज्य सरकार ने सर्वोच्च अदालत को स्पष्ट शब्दों में बताया है कि वर्ष 2020 में नियुक्त किसी भी शिक्षक को सेवा से नहीं हटाया जाएगा। यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप तैयार की गई संशोधित मेरिट सूची में नए अभ्यर्थी पात्र पाए जाते हैं तो उन्हें उपलब्ध रिक्त पदों पर नियुक्त किया जाएगा। सरकार का यह रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले दो वर्षों से सबसे बड़ा सवाल यही था कि यदि मेरिट सूची दोबारा बनी तो क्या पहले से नौकरी कर रहे शिक्षकों को बाहर होना पड़ेगा। अब सरकार ने इस आशंका को लगभग समाप्त करने की कोशिश की है।
इस पूरी कहानी की शुरुआत एक दिसंबर 2018 से होती है। उस दिन बेसिक शिक्षा विभाग ने 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती का विज्ञापन जारी किया। छह जनवरी 2019 को लिखित परीक्षा हुई। परीक्षा में लाखों अभ्यर्थी शामिल हुए। अगले ही दिन सरकार ने सामान्य वर्ग के लिए 65 प्रतिशत और आरक्षित वर्ग के लिए 60 प्रतिशत न्यूनतम अर्हता अंक तय कर दिए। यहीं से पहला विवाद शुरू हुआ। अभ्यर्थियों ने सवाल उठाया कि परीक्षा समाप्त होने के बाद कटऑफ तय करना नियमों के विपरीत है। सरकार का जवाब था कि प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए न्यूनतम योग्यता आवश्यक है। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। नवंबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए 65 और 60 प्रतिशत कटऑफ को वैध माना। सरकार को लगा कि अब भर्ती का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन असली विवाद तो इसके बाद शुरू हुआ।एक जून 2020 को सरकार ने 67,867 अभ्यर्थियों की पहली चयन सूची जारी की। कुल 69 हजार पदों में से अनुसूचित जनजाति वर्ग के 1,133 पद योग्य अभ्यर्थियों के अभाव में खाली रह गए। नियुक्तियां शुरू हुईं और हजारों शिक्षक विद्यालयों में पढ़ाने भी पहुंच गए। लेकिन इसी चयन सूची को लेकर आरक्षण व्यवस्था पर नया विवाद खड़ा हो गया। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि जिन उम्मीदवारों ने सामान्य वर्ग के बराबर या उससे अधिक अंक प्राप्त किए थे, उन्हें अनारक्षित सीटों पर स्थान नहीं दिया गया। उनका कहना था कि यदि ऐसे अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग में समायोजित किया जाता तो आरक्षित वर्ग की सीटों पर दूसरे पात्र उम्मीदवारों का चयन हो सकता था। दूसरी ओर सरकार और कुछ चयनित अभ्यर्थियों ने तर्क दिया कि जिन अभ्यर्थियों ने शिक्षक पात्रता परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में पांच प्रतिशत अंकों की छूट का लाभ लिया है, उन्हें सामान्य वर्ग में माइग्रेट नहीं किया जा सकता। यही कानूनी प्रश्न पूरे विवाद का केंद्र बन गया।
विवाद अदालत में पहुंचा तो कई नई व्याख्याएं सामने आईं। लंबी सुनवाई के बाद जनवरी 2022 में सरकार ने लगभग 6,800 अतिरिक्त अभ्यर्थियों की सूची जारी की। सरकार का दावा था कि आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा के बाद यह सूची तैयार की गई है। लेकिन इस सूची को भी चुनौती मिल गई। मार्च 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कहा कि 60 से 65 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को सामान्य श्रेणी में माइग्रेशन का लाभ नहीं मिलेगा। अदालत ने 2020 की चयन सूची में संशोधन और 6,800 अतिरिक्त अभ्यर्थियों की सूची को निरस्त करने का आदेश दिया। इस फैसले के बाद सबसे बड़ा संकट उन शिक्षकों के सामने खड़ा हो गया जो लगभग तीन वर्षों से विद्यालयों में पढ़ा रहे थे। उन्हें पहली बार अपनी नौकरी जाने का वास्तविक खतरा महसूस हुआ।मामला यहीं नहीं रुका। अगस्त 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को पलटते हुए नई मेरिट सूची तैयार करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि पूरी चयन प्रक्रिया उत्तर प्रदेश आरक्षण अधिनियम, 1994 के प्रावधानों के अनुरूप दोबारा तैयार की जाए ताकि किसी भी पात्र अभ्यर्थी के साथ अन्याय न हो। इस आदेश ने भर्ती विवाद को फिर नई दिशा दे दी। सरकार ने संशोधित मेरिट सूची तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी, लेकिन सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। इसके बाद मामला सर्वोच्च अदालत में लंबित रहा और सभी पक्ष अंतिम फैसले की प्रतीक्षा करने लगे।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से पूरी चयन प्रक्रिया का नया विश्लेषण प्रस्तुत करने को कहा गया। इसके बाद बेसिक शिक्षा विभाग ने रिकॉर्ड, मेरिट, आरक्षण और रिक्त पदों की दोबारा समीक्षा की। इसी समीक्षा के आधार पर सरकार ने अब विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है। हलफनामे में 8,270 ऐसे अभ्यर्थियों की संशोधित सूची अदालत के सामने रखी गई है जो वर्तमान में नौकरी में नहीं हैं। सरकार ने यह भी बताया कि पहले जारी सूची में 4,926 ऐसे अभ्यर्थी थे जिन्होंने चयनित होने के बावजूद कार्यभार ग्रहण नहीं किया। यानी हजारों पद ऐसे हैं जिन पर समायोजन की संभावना मौजूद है। सरकार का तर्क है कि यदि नई मेरिट सूची में कुछ अभ्यर्थी पात्र पाए जाते हैं तो उन्हें इन्हीं रिक्तियों और उपलब्ध पदों पर नियुक्त किया जा सकता है।इस हलफनामे का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि सरकार अब दो पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। एक ओर वे 67,867 शिक्षक हैं जो छह वर्षों से अधिक समय से विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। इनमें से अधिकांश ने ग्रामीण और दूरदराज के स्कूलों में अपनी सेवाएं दी हैं। दूसरी ओर वे हजारों अभ्यर्थी हैं जो दावा करते हैं कि यदि आरक्षण नियमों का सही पालन हुआ होता तो उनका चयन निश्चित था। अब सरकार ने पहली बार अदालत के सामने ऐसा प्रस्ताव रखा है जिसमें न तो कार्यरत शिक्षकों को हटाने की जरूरत पड़े और न ही पात्र अभ्यर्थियों के अधिकार पूरी तरह समाप्त हों।
इस पूरे विवाद ने सरकारी भर्ती व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। भर्ती की प्रक्रिया जितनी लंबी चली, उससे कहीं अधिक लंबा मुकदमा चला। सात वर्षों के दौरान अलग-अलग अदालतों के आदेश आए, नई सूचियां बनीं, पुरानी सूचियां रद्द हुईं, फिर नई व्याख्याएं सामने आईं। इस बीच हजारों युवाओं ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जारी रखी, कई अभ्यर्थी आयु सीमा पार कर गए और हजारों परिवार फैसले का इंतजार करते रहे। शिक्षा विभाग के लिए भी यह भर्ती प्रशासनिक चुनौती बनी रही, क्योंकि एक तरफ स्कूलों में शिक्षकों की जरूरत थी तो दूसरी तरफ अदालतों में भर्ती की वैधता पर लगातार बहस चल रही थी।अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। यदि सर्वोच्च अदालत सरकार के हलफनामे और संशोधित प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है तो संभव है कि उत्तर प्रदेश की सबसे लंबी शिक्षक भर्ती विवाद का अंत ऐसे समाधान के साथ हो, जिसमें किसी की नौकरी न जाए और पात्र अभ्यर्थियों को भी न्याय मिल सके। हालांकि अंतिम निर्णय अदालत को ही करना है, लेकिन सरकार के ताजा रुख ने यह संकेत जरूर दिया है कि वर्षों से टकराव की स्थिति में फंसे इस मामले को अब व्यावहारिक समाधान की ओर ले जाने की कोशिश शुरू हो चुकी है।69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती आज सिर्फ एक भर्ती का नाम नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना बन चुकी है जिसमें एक प्रशासनिक फैसला लाखों युवाओं की जिंदगी बदल सकता है और उसकी एक कानूनी व्याख्या वर्षों तक अनिश्चितता पैदा कर सकती है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला केवल 69 हजार अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहेगा। यह भविष्य की सरकारी भर्तियों, आरक्षण की व्याख्या और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी दूरगामी असर छोड़ेगा। सात साल से चल रही इस लड़ाई के बाद अब पहली बार ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित शिक्षक भर्ती अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही है।
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