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गुरुवार, 24 सितंबर 2026

Allahabad High Court: परित्याग के आधार पर तलाक के बाद भी पत्नी मांग सकती है भरण-पोषण, हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला


 

Allahabad High Court: परित्याग के आधार पर तलाक के बाद भी पत्नी मांग सकती है भरण-पोषण, हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि सिर्फ इस आधार पर कि पति ने पत्नी के परित्याग के आधार पर तलाक की डिक्री हासिल कर ली है, महिला का भरण-पोषण पाने का अधिकार अपने आप खत्म नहीं हो जाता। यदि तलाकशुदा महिला ने दोबारा शादी नहीं की है और वह खुद अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो वह पूर्व पति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है। न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की एकल पीठ ने यह फैसला सुलतानपुर परिवार न्यायालय के आदेश के खिलाफ दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया। हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के उस आदेश को स्वीकार नहीं किया, जिसमें महिला के भरण-पोषण के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया गया था।

2009 में दाखिल हुआ था भरण-पोषण का मुकदमा

मामले के अनुसार महिला ने वर्ष 2009 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए मुकदमा दाखिल किया था। महिला का आरोप था कि शादी के बाद पति और ससुराल वालों की ओर से अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर उसे परेशान किया गया। उसके मुताबिक एक लाख रुपये, मोटरसाइकिल और रंगीन टेलीविजन की मांग की गई थी। पति ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि महिला अपनी मर्जी से वैवाहिक घर छोड़कर चली गई थी। इसी आधार पर पति की ओर से उसके परित्याग का दावा किया गया। बाद में 25 सितंबर 2014 को पति को एकपक्षीय कार्यवाही के दौरान परित्याग के आधार पर तलाक की डिक्री मिल गई।

तलाक के बाद भी भरण-पोषण का दावा खत्म नहीं

हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यही था कि क्या परित्याग के आधार पर मिले तलाक के बाद महिला धारा 125 के तहत पूर्व पति से भरण-पोषण मांग सकती है। कोर्ट ने इस सवाल का जवाब हां में दिया। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2000 के रोहताश सिंह बनाम रामेंद्रि मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 125 के सीमित उद्देश्य के लिए तलाकशुदा महिला को भी पत्नी की श्रेणी में माना जाता है। इसलिए केवल तलाक हो जाने से उसका भरण-पोषण का अधिकार समाप्त नहीं होता।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक किस आधार पर हुआ, यह अकेले भरण-पोषण के दावे को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यदि महिला ने दोबारा शादी नहीं की है और वह खुद अपना खर्च चलाने में सक्षम नहीं है तो परिस्थितियों के अनुसार वह पूर्व पति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि परिवार न्यायालय द्वारा महिला के दावे को पूरी तरह खारिज करना कानूनी और तथ्यात्मक दृष्टि से उचित नहीं था।

पति ने बाद में दूसरी शादी भी की

मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि तलाक की डिक्री मिलने के बाद पति ने दूसरी शादी कर ली थी। रिकॉर्ड में दूसरी महिला का नाम उसकी सेवा संबंधी अभिलेखों में पत्नी के रूप में दर्ज होने की जानकारी भी सामने आई। हालांकि हाईकोर्ट के फैसले का मुख्य आधार यह नहीं था कि पति ने दूसरी शादी की, बल्कि यह था कि परित्याग के आधार पर तलाक मिलना अपने आप में पूर्व पत्नी को धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगने से नहीं रोकता।

25 सितंबर 2014 से दावे पर दोबारा विचार का आदेश

हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय को निर्देश दिया कि तलाक की तारीख यानी 25 सितंबर 2014 से महिला के भरण-पोषण के दावे पर नए सिरे से विचार किया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि तलाक से पहले की अवधि और तलाक के बाद की अवधि को अलग-अलग कानूनी परिस्थितियों में देखा जा सकता है। इस मामले में हाईकोर्ट ने तलाक के बाद की अवधि के दावे पर नए सिरे से निर्णय लेने को कहा है।कोर्ट ने महिला के नाबालिग बेटे के अधिकार को भी ध्यान में रखा। आदेश के अनुसार बेटा बालिग होने तक भरण-पोषण का हकदार रहेगा। अंतिम निर्णय होने तक पूर्व पति को महिला को 4,000 रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया है। साथ ही पक्षकारों को अपनी संपत्ति, आय और देनदारियों से संबंधित हलफनामे दाखिल करने के लिए कहा गया है, ताकि परिवार न्यायालय भरण-पोषण की उचित राशि पर नए सिरे से फैसला कर सके।

धारा 125 का उद्देश्य क्या है

धारा 125 के तहत भरण-पोषण की व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे मामलों में पत्नी, बच्चों और अन्य पात्र आश्रितों को आर्थिक संरक्षण देना है, जहां आवश्यक कानूनी शर्तें पूरी होती हैं। हाल के एक अन्य मामले में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि पत्नी का केवल शिक्षित होना या कमाने की क्षमता रखना अपने आप में भरण-पोषण के दावे को खत्म नहीं करता। अदालत वास्तविक और वर्तमान आर्थिक स्थिति को भी देखती है।इस मामले में भी हाईकोर्ट ने यही स्पष्ट किया कि तलाक की वजह और महिला की वर्तमान स्थिति को अलग-अलग कानूनी पहलुओं के रूप में देखा जाना चाहिए। महिला ने दोबारा शादी की है या नहीं और वह वास्तव में अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है या नहीं, जैसे तथ्यों की जांच जरूरी होगी। इसलिए इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि हर तलाकशुदा महिला को स्वतः भरण-पोषण मिल जाएगा। पात्रता मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर तय होगी।

हाईकोर्ट के फैसले की बड़ी बात

इस फैसले में अदालत ने मूल रूप से यह अंतर स्पष्ट किया है कि तलाक के बाद वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाता है, लेकिन धारा 125 के सीमित उद्देश्य के लिए तलाकशुदा महिला की स्थिति अलग तरीके से देखी जाती है। इसलिए केवल यह तथ्य कि पति को पत्नी के परित्याग के आधार पर तलाक मिला था, उसके भरण-पोषण के दावे को स्वतः समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दोबारा शादी और स्वयं के भरण-पोषण की क्षमता जैसे तथ्यों की जांच के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाना होगा।

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