IIT BTech 5 Year: चार नहीं पांच साल का हो बीटेक? पूर्व IIT दिल्ली निदेशक का बड़ा सुझाव, जानिए क्या बदलेगा
नई दिल्ली। देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में दाखिला लेने के लिए हर साल लाखों विद्यार्थी जेईई की तैयारी करते हैं। आईआईटी तक पहुंचने की इस कठिन प्रक्रिया में कोचिंग, प्रतियोगिता और लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव शामिल रहता है। लेकिन आईआईटी में दाखिले के बाद सभी विद्यार्थियों से एक ही गति से पढ़ने और समान समय में पाठ्यक्रम पूरा करने की अपेक्षा कितनी व्यावहारिक है? आईआईटी दिल्ली के पूर्व निदेशक और बिट्स पिलानी समूह के कुलपति प्रोफेसर वी. रामगोपाल राव ने इसी सवाल को उठाते हुए आईआईटी में बीटेक कार्यक्रम को पांच साल का करने का सुझाव दिया है।राव का कहना है कि आईआईटी की कक्षाओं में अब अलग-अलग शैक्षणिक पृष्ठभूमि और सीखने की गति वाले विद्यार्थी साथ पढ़ते हैं। ऐसे में सभी के लिए एक जैसा चार वर्षीय ढांचा हमेशा प्रभावी नहीं हो सकता। उन्होंने प्रस्ताव दिया है कि बीटेक को औपचारिक रूप से पांच साल का कार्यक्रम बनाया जाए, लेकिन जो विद्यार्थी जरूरी क्रेडिट पहले पूरे कर लें, उन्हें चार साल या संभवतः साढ़े तीन साल में भी डिग्री पूरी करने का विकल्प मिले।
एक ही कक्षा में सिंगल डिजिट से पांच अंकों तक की जेईई रैंक
राव ने आईआईटी की कक्षाओं में मौजूद शैक्षणिक अंतर को समझाने के लिए जेईई एडवांस्ड रैंक का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक, एक ही कक्षा में ऐसे विद्यार्थी हो सकते हैं जिनकी जेईई एडवांस्ड रैंक सिंगल डिजिट में रही हो और ऐसे भी जिनकी रैंक पांच अंकों तक गई हो।उन्होंने आईआईटी दिल्ली के कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग जैसे पाठ्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग स्तर की तैयारी के साथ आने वाले विद्यार्थियों को एक ही शिक्षक और एक ही गति से पढ़ाना चुनौतीपूर्ण है। इसके साथ भाषा भी सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला एक अतिरिक्त कारक हो सकती है।राव के अनुसार, अगर शिक्षक बहुत धीमी गति से पढ़ाता है तो पहले से मजबूत तैयारी वाले विद्यार्थियों की रुचि प्रभावित हो सकती है। वहीं यदि पाठ्यक्रम बहुत तेजी से आगे बढ़ाया जाए तो जिन विद्यार्थियों को किसी विषय को समझने के लिए अधिक समय चाहिए, वे पीछे छूट सकते हैं।
सिर्फ जेईई रैंक से नहीं तय होती पढ़ाई की क्षमता
राव ने एक महत्वपूर्ण अंतर की ओर भी ध्यान दिलाया है। जेईई एडवांस्ड में अच्छी रैंक हासिल करना और आईआईटी में स्वतंत्र रूप से किसी नई समस्या को हल करने की क्षमता हमेशा एक जैसी चीज नहीं होती।उनके मुताबिक, कई विद्यार्थी कोचिंग के दौरान एक खास प्रकार के सवालों को तेजी से हल करने का अभ्यास करते हैं। लेकिन जब आईआईटी में उन्हें ऐसा सवाल मिलता है, जिसे उन्होंने पहले नहीं देखा है, तो कुछ विद्यार्थियों के लिए उसे स्वतंत्र रूप से हल करना मुश्किल हो सकता है। यानी प्रवेश परीक्षा में प्रदर्शन और उच्च शिक्षा में नए तरीके से सोचने की क्षमता के बीच अंतर हो सकता है।
समस्या किसी एक प्रवेश श्रेणी तक सीमित नहीं
राव ने इस चुनौती को किसी एक प्रवेश श्रेणी या किसी विशेष समूह के विद्यार्थियों से जोड़ने से भी इनकार किया। उनका कहना है कि कोचिंग आधारित तैयारी से निकलकर स्वतंत्र अध्ययन की ओर जाना कई विद्यार्थियों के लिए कठिन हो सकता है।इसका अर्थ यह है कि आईआईटी में विद्यार्थी के प्रवेश के समय की रैंक या पृष्ठभूमि के बजाय संस्थान के भीतर उसके प्रदर्शन और सीखने की गति को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। राव के प्रस्ताव में यही बात केंद्रीय है कि विद्यार्थी को आवश्यक शैक्षणिक स्तर तक पहुंचने के लिए पर्याप्त समय और सहायता मिले।
कैसे काम करेगा पांच साल का बीटेक मॉडल?
राव ने जिस मॉडल का सुझाव दिया है, उसमें पांच साल की अवधि अधिकतम उपलब्ध समय के रूप में काम करेगी। इसका मतलब यह नहीं होगा कि हर विद्यार्थी को अनिवार्य रूप से पांच साल ही पढ़ना पड़ेगा।प्रस्ताव के मुताबिक, जो विद्यार्थी आवश्यक क्रेडिट जल्दी पूरे कर लेते हैं, वे चार साल में डिग्री पूरी कर सकते हैं। कुछ विद्यार्थियों के लिए साढ़े तीन साल में पूरा करने की संभावना भी रखी जा सकती है। दूसरी ओर, जिन विद्यार्थियों को अधिक समय की जरूरत हो, वे पांच साल की अवधि का इस्तेमाल कर सकेंगे।पांचवें साल का इस्तेमाल केवल अतिरिक्त समय के तौर पर नहीं बल्कि अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता के लिए किया जा सकता है। राव ने रिकॉर्ड किए गए व्याख्यान, ऑनलाइन अध्ययन सामग्री, अतिरिक्त अकादमिक सहायता और जरूरत के अनुसार भाषा संबंधी मदद का सुझाव दिया है।
पांच साल का ढांचा मानसिक दबाव भी घटा सकता है
राव के प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण पहलू मानसिक दबाव से जुड़ा है। वर्तमान चार वर्षीय ढांचे में यदि किसी विद्यार्थी को डिग्री पूरी करने में अतिरिक्त समय लगता है तो उसे कई बार यह महसूस हो सकता है कि वह अपने साथियों से पीछे रह गया है।राव का सुझाव है कि यदि पांच साल का कार्यक्रम सामान्य ढांचे के रूप में बनाया जाए तो अतिरिक्त समय लेने वाला विद्यार्थी अलग या असफल नहीं माना जाएगा। जो विद्यार्थी तेजी से क्रेडिट पूरे कर लें, वे पहले निकल जाएंगे और जिन्हें अधिक समय चाहिए, वे निर्धारित पांच साल में अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे।
आईआईटी बॉम्बे विवाद के बीच सामने आया सुझाव
राव ने यह सुझाव आईआईटी बॉम्बे के बीटेक छात्र साहिल वाकोड़े की मौत के बाद बने विवाद के बीच दिया है। इसी मामले में आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला को लेकर भी विवाद चल रहा है।राव ने सोशल मीडिया पर डूला के समर्थन में अपनी राय रखते हुए कहा कि उनके खिलाफ उठाई गई चिंताओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और किसी व्यक्ति के खिलाफ सार्वजनिक अभियान उचित नहीं है। उन्होंने डूला को आईआईटी प्रणाली में अपने अनुभव के आधार पर अच्छे शिक्षकों में से एक बताया। हालांकि, यह राव की व्यक्तिगत राय है और मामले में लगे आरोपों या जांच के निष्कर्ष का स्थान नहीं लेती।
25 साल से ज्यादा का आईआईटी अनुभव
वी. रामगोपाल राव आईआईटी दिल्ली के निदेशक के रूप में 2016 से 2021 तक काम कर चुके हैं। उन्होंने आईआईटी बॉम्बे और आईआईटी दिल्ली में 25 साल से अधिक समय तक काम करने का अनुभव बताया है। वर्तमान में वह बिट्स पिलानी समूह के कुलपति हैं।उनका पांच वर्षीय बीटेक मॉडल अभी कोई लागू नीति या आईआईटी का आधिकारिक फैसला नहीं है। यह एक शैक्षणिक सुधार का प्रस्ताव है। इसे लागू करने के लिए आईआईटी संस्थानों और संबंधित नियामक स्तर पर व्यापक चर्चा और निर्णय की आवश्यकता होगी।फिलहाल राव की टिप्पणी ने आईआईटी शिक्षा के एक पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है क्या देश के सबसे कठिन इंजीनियरिंग संस्थानों में दाखिले के बाद सभी विद्यार्थियों से एक ही गति से सीखने की उम्मीद की जानी चाहिए, या संस्थान को विद्यार्थियों की अलग-अलग जरूरतों के अनुसार पढ़ाई की गति और अवधि में अधिक लचीलापन देना चाहिए?
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